​​​​​​​खपली-बंशी गेहूं से बदली किस्मत, कमाई दोगुनी:विदेश से नौकरी छोड़ शिवपुरी लौटे महिम, 180 किलो कीमत का उगा रहे गेहूं

दैनिक भास्कर की स्मार्ट किसान सीरीज में इस बार आपको एक ऐसे किसान से मिलवाते हैं, जिसने एमबीए की डिग्री ली और ओमान की नौकरी छोड़कर कृषि क्षेत्र में एक नई क्रांति की शुरुआत की है। ओमान से मध्यप्रदेश के शिवपुरी लौटे महिम भारद्वाज ने हजारों साल पुरानी गेहूं की प्रजातियों `खपली` और `बंशी` को फिर से जमीन पर लौटाकर जैविक खेती का एक नया अध्याय लिख दिया है। आधुनिक खेती को छोड़कर पारंपरिक और जैविक तरीकों से खेती कर वे न सिर्फ दो गुना ज्यादा मुनाफा कमा रहे हैं, बल्कि 600 से अधिक किसानों के लिए प्रेरणा भी बन गए हैं। खपली गेहूं 180 और बंशी 160 प्रति किलो में बिका महिम ने शुरुआत में बड़ा गांव में 10 बीघा जमीन पर खपली और बंशी गेहूं बोया। उपज मात्र 3 क्विंटल प्रति बीघा रही, लेकिन जब खपली गेहूं 180 और बंशी 160 प्रति किलो में बिका, तो उन्हें विश्वास हो गया कि जैविक खेती टिकाऊ और लाभदायक दोनों हो सकती है। यह कीमत बाजार में मिलने वाले सामान्य गेहूं (MSP ₹26 प्रति किलो) से कई गुना अधिक है। महिम का कहना है कि 10 बीघा खेती में जैविक और हाईब्रिड दोनों ही तरह की गेहूं की खेती में सवा लाख का खर्च आता है। हाईब्रिड का उत्पादन एक बीघा में 10 क्विंटल और जैविक का 3 क्विंटल रहता है। जैविक का रेट ज्यादा होने से यह पांच लाख की बिकती है तो हाईब्रिड गेहूं का उत्पादन ज्यादा होने के बाद भी ढाई लाख में ही बिकता है। पढ़ाई और नौकरी के बाद लौटे खेतों में महिम भारद्वाज के पिता प्रेम नारायण शर्मा खुद किसान थे और उस दौर में एमए, एलएलबी जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके थे। उन्हीं से प्रेरणा लेकर महिम ने 1996 में एमबीए किया और देश के विभिन्न हिस्सों में मार्केटिंग क्षेत्र में काम किया। बाद में वह ओमान की एक निजी कंपनी में अधिकारी बने। लेकिन 2020 में एक मोड़ ऐसा आया जिसने उनकी दिशा ही बदल दी। उनके मित्र संदीप शर्मा, जो खुद एक इंजीनियर रह चुके हैं, 2004 से जैविक खेती में जुड़ें थे। उन्हीं के कहने पर महिम दुबई एक्सपो में शामिल हुए, जहां स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर प्रेजेंटेशन ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। फिर उन्होंने तय कर लिया कि वह अपने देश लौटकर न केवल माता-पिता की सेवा करेंगे, बल्कि जैविक खेती के जनअभियान से भी जुड़ेंगे। 2022 में वे स्थायी रूप से शिवपुरी लौट आए। सेहत के लिए भी वरदान है खपली और बंशी गेहूं महिम के अनुसार हाइब्रिड गेहूं में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है जबकि मिनरल और फाइबर की कमी रहती है। यही कारण है कि डॉक्टर डायबिटीज के मरीजों को गेहूं से परहेज करने की सलाह देते हैं। महिम का मानना है कि बाजार में मिलने वाला पैकेट वाला आटा महीनों खराब नहीं होता, क्योंकि उसमें केमिकल्स मिलाए जाते हैं। वहीं घर में पिसा हुआ आटा एक महीने में खराब हो जाता है, लेकिन वह शरीर के लिए कहीं ज्यादा फायदेमंद होता है। पैकेट आटे से गेहूं की पहली परत, रवा और मैदा अलग कर दी जाती है, जिससे उसमें पोषण की मात्रा घट जाती है। 600 किसानों का बनाया नेटवर्क महिम ने सोशल मीडिया पर अपने जैविक खेती के अनुभव साझा किए, जिससे देशभर के किसान उनसे जुड़ते चले गए। आज उनके जैविक खेती मिशन से मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के 600 से अधिक किसान जुड़ चुके हैं। ये सभी किसान अब रसायनमुक्त खेती की ओर बढ़ चुके हैं। महिम से जानते हैं जैविक खेती की विशेषताएं महिम ने अपने खेतों में रासायनिक खाद या कीटनाशकों का उपयोग पूरी तरह बंद कर दिया। इसके बजाय वे गोबर, छाछ, गुड़ और 'गौ कृपा अमृत' से बने 'जैवामृत' का प्रयोग करते हैं। एक बीघा खेत में दो बार जैवामृत का प्रयोग मात्र 2000 रुपये में हो जाता है, जो रासायनिक खेती की तुलना में पांच गुना कम है। महिम भारद्वाज ने कहा-मिशन सिर्फ मुनाफा नहीं, धरती का संरक्षण भी महिम भारद्वाज का स्पष्ट उद्देश्य है "खेती से मुनाफा तो हो, लेकिन मिट्टी, जल और स्वास्थ्य का भी संरक्षण हो। "जैविक खेती से न सिर्फ लागत कम होती है, बल्कि उपभोक्ताओं को रसायनमुक्त, पोषणयुक्त अनाज भी मिलता है। महिम का कहना है कि शिक्षा, विदेशी अनुभव और जमीन से जुड़ाव से उन्हें एक नई पहचान मिली है। वे न केवल एक सफल जैविक किसान हैं, बल्कि सैकड़ों किसानों के लिए प्रेरणास्त्रोत भी हैं। उनके प्रयासों ने यह सिद्ध कर दिया कि सोच अगर सकारात्मक हो, तो खेती भी देश को बदल सकती है। ये भी पढ़ें... गांधी सागर के डूब क्षेत्र में खरबूजे उगा रहे किसान: 5 महीने पानी खाली होने पर कर रहे खेती; बीज बेचकर होता है दोहरा फायदा नीमच में चंबल नदी के डूब क्षेत्र की जमीन में इन दिनों खरबूजे की खेती की जा रही है। खास बात है कि गांधी सागर डैम के बैक वाटर में सालभर में पांच महीने पानी भरा रहता है। किसान इस जमीन से दोहरा लाभ कमा रहे हैं। एक तरफ सरकार से जमीन का मुआवजा लिया है। वहीं, गर्मियों में खरबूजे के बीज बेच रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर... बड़वानी के G 9 केले की विदेशों में भारी मांग: इंजीनियरिंग छोड़ केले की खेती से 16 लाख सालाना कमा रहा किसान मध्यप्रदेश का बड़वानी आधुनिक खेती के लिए देश-विदेश में अलग पहचान बना रहा है। यहां के केले की मांग मिडिल ईस्ट के देशों तक है। 12 टन से अधिक केले ईरान और इराक भेजे गए हैं। इंजीनियर लोकेश कुमावत 12 एकड़ में केले की G 9 (ग्रैंड नैने) प्रजाति की खेती कर रहे हैं। इससे सालाना 16 लाख रुपए तक मुनाफा कमा रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर...

​​​​​​​खपली-बंशी गेहूं से बदली किस्मत, कमाई दोगुनी:विदेश से नौकरी छोड़ शिवपुरी लौटे महिम, 180 किलो कीमत का उगा रहे गेहूं
दैनिक भास्कर की स्मार्ट किसान सीरीज में इस बार आपको एक ऐसे किसान से मिलवाते हैं, जिसने एमबीए की डिग्री ली और ओमान की नौकरी छोड़कर कृषि क्षेत्र में एक नई क्रांति की शुरुआत की है। ओमान से मध्यप्रदेश के शिवपुरी लौटे महिम भारद्वाज ने हजारों साल पुरानी गेहूं की प्रजातियों `खपली` और `बंशी` को फिर से जमीन पर लौटाकर जैविक खेती का एक नया अध्याय लिख दिया है। आधुनिक खेती को छोड़कर पारंपरिक और जैविक तरीकों से खेती कर वे न सिर्फ दो गुना ज्यादा मुनाफा कमा रहे हैं, बल्कि 600 से अधिक किसानों के लिए प्रेरणा भी बन गए हैं। खपली गेहूं 180 और बंशी 160 प्रति किलो में बिका महिम ने शुरुआत में बड़ा गांव में 10 बीघा जमीन पर खपली और बंशी गेहूं बोया। उपज मात्र 3 क्विंटल प्रति बीघा रही, लेकिन जब खपली गेहूं 180 और बंशी 160 प्रति किलो में बिका, तो उन्हें विश्वास हो गया कि जैविक खेती टिकाऊ और लाभदायक दोनों हो सकती है। यह कीमत बाजार में मिलने वाले सामान्य गेहूं (MSP ₹26 प्रति किलो) से कई गुना अधिक है। महिम का कहना है कि 10 बीघा खेती में जैविक और हाईब्रिड दोनों ही तरह की गेहूं की खेती में सवा लाख का खर्च आता है। हाईब्रिड का उत्पादन एक बीघा में 10 क्विंटल और जैविक का 3 क्विंटल रहता है। जैविक का रेट ज्यादा होने से यह पांच लाख की बिकती है तो हाईब्रिड गेहूं का उत्पादन ज्यादा होने के बाद भी ढाई लाख में ही बिकता है। पढ़ाई और नौकरी के बाद लौटे खेतों में महिम भारद्वाज के पिता प्रेम नारायण शर्मा खुद किसान थे और उस दौर में एमए, एलएलबी जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके थे। उन्हीं से प्रेरणा लेकर महिम ने 1996 में एमबीए किया और देश के विभिन्न हिस्सों में मार्केटिंग क्षेत्र में काम किया। बाद में वह ओमान की एक निजी कंपनी में अधिकारी बने। लेकिन 2020 में एक मोड़ ऐसा आया जिसने उनकी दिशा ही बदल दी। उनके मित्र संदीप शर्मा, जो खुद एक इंजीनियर रह चुके हैं, 2004 से जैविक खेती में जुड़ें थे। उन्हीं के कहने पर महिम दुबई एक्सपो में शामिल हुए, जहां स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर प्रेजेंटेशन ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। फिर उन्होंने तय कर लिया कि वह अपने देश लौटकर न केवल माता-पिता की सेवा करेंगे, बल्कि जैविक खेती के जनअभियान से भी जुड़ेंगे। 2022 में वे स्थायी रूप से शिवपुरी लौट आए। सेहत के लिए भी वरदान है खपली और बंशी गेहूं महिम के अनुसार हाइब्रिड गेहूं में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है जबकि मिनरल और फाइबर की कमी रहती है। यही कारण है कि डॉक्टर डायबिटीज के मरीजों को गेहूं से परहेज करने की सलाह देते हैं। महिम का मानना है कि बाजार में मिलने वाला पैकेट वाला आटा महीनों खराब नहीं होता, क्योंकि उसमें केमिकल्स मिलाए जाते हैं। वहीं घर में पिसा हुआ आटा एक महीने में खराब हो जाता है, लेकिन वह शरीर के लिए कहीं ज्यादा फायदेमंद होता है। पैकेट आटे से गेहूं की पहली परत, रवा और मैदा अलग कर दी जाती है, जिससे उसमें पोषण की मात्रा घट जाती है। 600 किसानों का बनाया नेटवर्क महिम ने सोशल मीडिया पर अपने जैविक खेती के अनुभव साझा किए, जिससे देशभर के किसान उनसे जुड़ते चले गए। आज उनके जैविक खेती मिशन से मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के 600 से अधिक किसान जुड़ चुके हैं। ये सभी किसान अब रसायनमुक्त खेती की ओर बढ़ चुके हैं। महिम से जानते हैं जैविक खेती की विशेषताएं महिम ने अपने खेतों में रासायनिक खाद या कीटनाशकों का उपयोग पूरी तरह बंद कर दिया। इसके बजाय वे गोबर, छाछ, गुड़ और 'गौ कृपा अमृत' से बने 'जैवामृत' का प्रयोग करते हैं। एक बीघा खेत में दो बार जैवामृत का प्रयोग मात्र 2000 रुपये में हो जाता है, जो रासायनिक खेती की तुलना में पांच गुना कम है। महिम भारद्वाज ने कहा-मिशन सिर्फ मुनाफा नहीं, धरती का संरक्षण भी महिम भारद्वाज का स्पष्ट उद्देश्य है "खेती से मुनाफा तो हो, लेकिन मिट्टी, जल और स्वास्थ्य का भी संरक्षण हो। "जैविक खेती से न सिर्फ लागत कम होती है, बल्कि उपभोक्ताओं को रसायनमुक्त, पोषणयुक्त अनाज भी मिलता है। महिम का कहना है कि शिक्षा, विदेशी अनुभव और जमीन से जुड़ाव से उन्हें एक नई पहचान मिली है। वे न केवल एक सफल जैविक किसान हैं, बल्कि सैकड़ों किसानों के लिए प्रेरणास्त्रोत भी हैं। उनके प्रयासों ने यह सिद्ध कर दिया कि सोच अगर सकारात्मक हो, तो खेती भी देश को बदल सकती है। ये भी पढ़ें... गांधी सागर के डूब क्षेत्र में खरबूजे उगा रहे किसान: 5 महीने पानी खाली होने पर कर रहे खेती; बीज बेचकर होता है दोहरा फायदा नीमच में चंबल नदी के डूब क्षेत्र की जमीन में इन दिनों खरबूजे की खेती की जा रही है। खास बात है कि गांधी सागर डैम के बैक वाटर में सालभर में पांच महीने पानी भरा रहता है। किसान इस जमीन से दोहरा लाभ कमा रहे हैं। एक तरफ सरकार से जमीन का मुआवजा लिया है। वहीं, गर्मियों में खरबूजे के बीज बेच रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर... बड़वानी के G 9 केले की विदेशों में भारी मांग: इंजीनियरिंग छोड़ केले की खेती से 16 लाख सालाना कमा रहा किसान मध्यप्रदेश का बड़वानी आधुनिक खेती के लिए देश-विदेश में अलग पहचान बना रहा है। यहां के केले की मांग मिडिल ईस्ट के देशों तक है। 12 टन से अधिक केले ईरान और इराक भेजे गए हैं। इंजीनियर लोकेश कुमावत 12 एकड़ में केले की G 9 (ग्रैंड नैने) प्रजाति की खेती कर रहे हैं। इससे सालाना 16 लाख रुपए तक मुनाफा कमा रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर...