अखंड सौभाग्य का पर्व गणगौर

-संजय हरनारायण मोहता रायपुर, 21 मार्च। गणगौर का त्यौहार मुख्य रूप से राजस्थानियों का त्यौहार है, यह त्यौहार चैत्र शुक्ल तृतीया को शिव (ईसर) और पार्वती (गौरा) के रूप में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक उत्सव है। गणगौर का अर्थ गण मतलब भगवान शिव और गौर का अर्थ माता पार्वती से है । जिन्हें ईसर या ईश्वर के रूप में पूजा जाता है। यह त्यौहार चैत्र कृष्ण पक्ष की तृतीया से शुरू होकर 16 दिनों तक चलता है। यह 16 दिनों का त्यौहार है, जो रंगीन परंपराओं और आस्था के साथ मनाया जाता है ।कुंवारी लड़कियां और विवाहित महिलाएं मिट्टी से ईसर और गौरा की मूर्तियां बनाकर उन्हें श्रद्धा के साथ पूजा में स्थापित किया जाता है, फिर उनकी उनकी पूजा करती हैं। 16-16 बिंदियां (दीवार पर) लगाकर सुहाग जल (दूध, दही, हल्दी मिश्रित) से पारंपरिक वेश भूषा और श्रृंगार के साथ पारंपरिक गीतों के साथ पूजा की जाती है। गणगौर माता को गुणा (एक प्रकार का पकवान) और सिंजारा का भोग लगाया जाता है। पूजा अर्चना कर प्रसाद में मेहंदी वितरित किया जाता है । अंतिम दिन गणगौर की भव्य सवारी निकाली जाती है, जो शिव-पार्वती के मिलन का उत्सव है। गणगौर की पूजा अखंड सौभाग्य और सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए किया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने कठोर तपस्या से शिवजी को प्राप्त किया था, इसलिए यह पर्व प्रेम, भक्ति और दाम्पत्य जीवन में अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व कुंवारी कन्याओं के लिए मनचाहा वर पाने और सुहागिनों के लिए पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना का त्यौहार है।

अखंड सौभाग्य का पर्व गणगौर
-संजय हरनारायण मोहता रायपुर, 21 मार्च। गणगौर का त्यौहार मुख्य रूप से राजस्थानियों का त्यौहार है, यह त्यौहार चैत्र शुक्ल तृतीया को शिव (ईसर) और पार्वती (गौरा) के रूप में मनाया जाने वाला एक पारंपरिक उत्सव है। गणगौर का अर्थ गण मतलब भगवान शिव और गौर का अर्थ माता पार्वती से है । जिन्हें ईसर या ईश्वर के रूप में पूजा जाता है। यह त्यौहार चैत्र कृष्ण पक्ष की तृतीया से शुरू होकर 16 दिनों तक चलता है। यह 16 दिनों का त्यौहार है, जो रंगीन परंपराओं और आस्था के साथ मनाया जाता है ।कुंवारी लड़कियां और विवाहित महिलाएं मिट्टी से ईसर और गौरा की मूर्तियां बनाकर उन्हें श्रद्धा के साथ पूजा में स्थापित किया जाता है, फिर उनकी उनकी पूजा करती हैं। 16-16 बिंदियां (दीवार पर) लगाकर सुहाग जल (दूध, दही, हल्दी मिश्रित) से पारंपरिक वेश भूषा और श्रृंगार के साथ पारंपरिक गीतों के साथ पूजा की जाती है। गणगौर माता को गुणा (एक प्रकार का पकवान) और सिंजारा का भोग लगाया जाता है। पूजा अर्चना कर प्रसाद में मेहंदी वितरित किया जाता है । अंतिम दिन गणगौर की भव्य सवारी निकाली जाती है, जो शिव-पार्वती के मिलन का उत्सव है। गणगौर की पूजा अखंड सौभाग्य और सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए किया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने कठोर तपस्या से शिवजी को प्राप्त किया था, इसलिए यह पर्व प्रेम, भक्ति और दाम्पत्य जीवन में अटूट विश्वास का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व कुंवारी कन्याओं के लिए मनचाहा वर पाने और सुहागिनों के लिए पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना का त्यौहार है।