चन्दूलाल चन्द्राकर पुरस्कार

चन्दूलाल चन्द्राकर पुरस्कार

02-Oct-2018
चन्दूलाल चन्द्राकर पुरस्कार छत्तीसगढ़ ले बाहिर जाके रास्ट््रीय स्तर मं पत्रकारिता करइया ये प्रदेस के जेन विलक्षण पत्रकार के नाम लेय जाथे उनमा चनदूलाल चंद्राकर प्रमुख हें। उनकर जन्म 1 जनवरी 1921 के दुर्ग जिला के निपानी गांव के कृसक परिवार मं होइस। उन बाल काल से ही मेधावी रहिन। दुर्ग मं प्रारंभिक षिक्षा के दौरान साहित्य अउ खेलकूद के प्रति उनकर रूझान रहिस। अंचल ले उनला बड़ लगाव रहिस। ग्रामीण मनके समस्या के समाधान करे मं उन सदैव तत्पर रहंय। राजनीति के पूर्व उन सक्रिय पत्रकारिता ले जुड़े रहिन। द्वितीय विष्वयुद्ध के समय से उन अपन पत्रकारिता ल गति देइन अउ धीरे धीरे मंजे हुए पत्रकार बन गये। 1945 से पत्रकार के रूप मं देस भर मं उनकर पहिचान बनगे। चंदूलाल चंद्राकर के लिखे समाचार देस विदेस के अनेक अखबार मं प्रकासित होय लगिस। उनला नौ ओलंपिक खेल अउ तीन एषियाई खेल के रिपोर्टिग के गहिरा अनुभव रहिस। चन्दूलाल चंद्राकर रास्ट््रीय अखबार दैनिक हिन्दुस्तान मं संपादक के रूप मं घलव आपन सेवा देइन। छत्तीसगढ़ से रास्ट््रीय समाचार पत्र के संपादक पद मं पहुंचने वाला उन प्रमुख पत्रकार रहिन। युद्ध स्थल से रिपोर्टिग करे के उनला अनुभव रहिस। उन विष्व के लगभग जम्मों देष मनके यात्रा पत्रकार के रूप मं करिन। ये कउनों भी पत्रकार बर बड़ उपलब्धि के बात हे। उनमन 1970 मं पहिली बेर लोक सभा के निर्वाचित सदस्य होय के संगे संग सक्रिय राजनीति मं हिस्सा लेइन। उन लोक सभा के सदस्य बर पांच बेर निर्वाचित होइन। पर्यटन, नागरिक उड्डयन, कृसि, ग्रामीण विकास जइसन महत्वपूर्ण विभाग मनके मंत्री के दायित्व संभालत देष के सेवा करिन। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव अउ मध्यप्रदेस कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता के रूप मं उन सक्रिय रहिन। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण सर्वदलीय मंच के अध्यक्ष रहिके उन राज्य आंदोलन ल नवां सक्ति देइन। अपन लेखनी ले ज्वलंत मुद्दा उठाय बहंस के गुंजाइस तैयार करने वाला पत्रकार मं चंदूलाल चंद्राकर के सम्मानजनक स्थान रहिस। 2 फरवरी 1995 के उनकर निधन हो गइस। श्रेस्ठ पत्रकारिता ले छत्तीसगढ़ के नाम रोसन करइया व्यक्ति ले नवां पीढ़ी पे्ररणा ग्रहण करय। मूल्य आधारित पत्रकारिता ल प्रोत्साहन मिलय एकर खातिर छत्तीसगढ़ सासन उनकर स्मृति मं पत्रकारिता के क्षेत्र मं चन्दूलाल चंद्राकर सम्मान 2001 से स्थापित करे हे।
गुण्डाधूर सम्मान

गुण्डाधूर सम्मान

02-Oct-2018
गुण्डाधूर सम्मान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मं जनजातीय क्षेत्र के क्रंातिवीर मन मं बस्तर के गुण्डाधूर के नाम बहुंत श्रद्धा के साथ लेय जाथे। इनकर जन्म बस्तर के नेतानार गांव मं होय रहिस। धुरवा जाति के ये वीर युवक सन् 1910 के आदिवासी विद्रोह के प्रमुख सूत्रधार रहिस। वो समय अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनता के आक्रोस बस्तर मं भूमकाल के रूप मं प्रकट होय रहिस। ये जागरन के केन्द्र मं गुण्डाधूर के अदम्य साहस, सौर्य अउ उनकर रणनीति ले आदिवासी समुदाय बहुंत प्रभावित होइस। फरवरी 1910 के समूचा बस्तर मं विद्रोह के भूचाल आ गेय रहिस। गुण्डाधूर के नेतृत्व मं अंग्रेंजी षासन के जड़ ले उखाड़ फेके खातिर सासकीय संस्था मनके अउ संपत्ति ल निसाना बनाय गइस। गुण्डाधूर ह अपन सहयोगी मनला सकेल के गांव अलनार मं अंगे्रज मन संग मुकाबला करिन। गुण्डाधूर ल चारो मुड़ा ले घेर लेय गईस। फेर सैनिक मनके बंदूक के सामना करत हुए वो बंच निकलिन। अंग्रेज मन वोला बस्तर के चप्पाचप्पा छान मारिन, लेकिन गुण्डाधूर अंत तक पकड़ मं नई आइन। उन एक महान सेनानी, छापा मार युद्ध के जानकार अउ देष भक्त होय के संगे संग आदिवासी मनके पारंपरिक हित के रक्षा खातिर बड़ जागरूक रहिन। छत्तीसगढ़ सासन ह उनकर स्मृति मं साहसिक काम अउ खेल के क्षेत्र मं उत्कृस्ट प्रदर्सन के खातिर गुण्डाधूर के नाव मं सम्मान के स्थापना करे हे। ये सम्मान के स्थापना सन 2001 ले करे गेय हे।
डॉ खूबचंद बघेल सम्मान

डॉ खूबचंद बघेल सम्मान

02-Oct-2018
डाॅं. खूबचंद बघेल सम्मान डाॅं. खूबचंद बघेल के समर्पण जीवन समाज अउ कृसक मनके कल्याण अउ विभिन्न रचनात्मक कार्य बर समर्पित रहिस। इनकर जनम रायपुर जिला के पथरी गांव मं 19 जुलाई 1900 के होय रहिस। पिता के नाम जुड़ावन प्रसाद अउ माता के नाम केकती बाई रहिस। डाॅ. खूबचन्द बघेल के प्रारंभिक सिक्षा गांव मं अउ हाईस्कूल के पढ़ाई रायपुर मं होईस। 1925 मं नागपुर ले चिकित्सा परीक्षा उत्तीर्ण करे के पाछू असिस्टेंट मंेडिकली आफिसर के रूप मं कार्यरत रहिन। 1930 मं नमक सत्याग्रह के दौरान सासकीय नौकरी छोड़ के उन आंदोलन मं सामिल हो गइन। 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह मं तीसर बेर जेल गइन। 1942 मं भारत छोड़ो अंादोलन मं इनला फेर ढाई बछर के कठोर कैद होईस। डाॅ. खूबचंद बघेल 1951 मं विधान सभा के सदस्य निर्वाचित होइन अउ 1962 तक सदस्य रहिन। 1967 मं इनला राज्य सभा के सदस्य चुने गइस। डाॅं. खूबचंद बघेल कृसि ल उद्योग के समकक्ष विकसित करे के दिसा मं अभूतपूर्व प्रयास करिन। पृथक छत्तीसगढ़ राज्य बर जन चेतना जागृत करे के दिसा मं उन लगातार संलग्न रहिन। साहित्य सृजन लोक-मंचीय प्रस्तुति अउ बोलचाल मं उन छत्तीसगढ़ी के पक्षधर रहिन। इन उद्देस्य मनला पूरा करे खातिर उनमन 1967 मं रायपुर मं ‘‘छत्तीसगढ़ - भ्रातृ संघ नामक संस्था के गठन करिन। 22 फरवरी 1969 के उनकर निधन हो गइस। छत्तीसगढ़ शासन उनकर स्मृति मं कृसि के क्षेत्र मं महत्वपूर्ण उपलब्धि अउ अनुसंधान ल बढ़ावा देय बर डाॅ. खूबचंद बघेल सम्मान स्थापित करे हे। ये सम्मान 2001 ले स्थापित करे गेय हे।
 तपस्वी योगी स्वामी आत्मानंद

तपस्वी योगी स्वामी आत्मानंद

15-Sep-2018
पुरखा के सुरता - तपस्वी योगी स्वामी आत्मानंद (1) स्वामी जी के जीवन परिचय :- स्वामी जी के जन्म 6 अक्टूबर 1929 के बिहनिया बेर के ब्रम्ह मुहरत में ग्राम बरबंदा मा होइस हे। आपमन के माताजी के नाव भाग्यवती रिहिस हे, आपमन के माताजी हा बहुत धरम करम ला मानने वाला महिला रिहिस हे, भगवान भोलेनाथ के भक्ति भाव से पूजा करय, एक बार चमत्कारिक घटना होइस। जब आपमन के माताजी हा गर्भ मा रिहिस हे वो समय 5 अक्टूबर के रात कन भगवान भोलेनाथ हा सपना में प्रसन्न मुद्रा में खड़े रिहिस हे दूसर क्षन वो दिव्य शिशु बन के भाग्यवती के गोद मा खेले ले लागिस, भाग्यवती वो लइका ला स्तनपान करावत रिहिस हे, थोड़ा देर बाद भाग्यबती के नींद खुल गे अऊ ऊही दिन सुन्दर बालक तुलेंद्र के जन्म होइस। आपमन के बाबूजी के नाव धनीराम वर्मा मांढर स्कूल में शिक्षक रिहिस हे, सामाजिक कारन के वजह से देशभर के दौरा आपमन करत रेहे हव, स्वदेशी आंदोलन मा भी जुड़े रेहे हव, एक बार जिला भर के व्यायाम प्रतियोगिता में आपमन पहला आय हव जेमा 184 तोला चांदी अऊ भीम गदा इनाम मा मिलिस। जन्म राशि के आधार ले आपमन के नाव रामेश्वर रखे गे रिहिस हे, बाद में स्कूल भर्ती करे समय मा आपमन के नाव तुलेंद्र रखे गे रिहिस हे। आपमन के पढ़ाई के लगन ला देखत हुए 4 साल मा मांढर के स्कूल मा भर्ती करा दे गे रिहिस हे। डेढ़ साल के उमर मा आपमन हा राम नाम के संकीर्तन करात रेहे हव, आपमन 4 साल के उमर मा टाउन हॉल मा हारमोनियम ला बजा के गीत गाय रेहे हव जेन ला सुन के दर्शकगण अऊ अऊ पंडित रविशंकर शुक्ल हा दंग रिगे रिहिस हे। (2) स्वामी जी की शिक्षा :- आपमन मैट्रिक ला प्रथम श्रेणी ले पास करे हव। आगे के पढाई के व्यवस्था रइपुर मा नई होय के कारण नागपुर के साइंस कॉलेज मा भर्ती होय हव। उहा हॉस्टल के व्यवस्था नई होय के कारण आपमन रामकृष्ण मा रई के अध्ययन करे हव। आपमन हा एमएससी ला प्रथम श्रेणी ले उतीर्ण करेव, संगवारी मन के सलाह ले आईएएस के परीक्षा भी दिलायव जेमा आपमन ला प्रथम 10 उमीदवार मा स्थान मिले रिहिस हे, मानव सेवा के भाव के कारण आपमन ये नौकरी ला नई करे हव, बाद में रामकृष्ण के विचारधारा ले जुड़ के कठिन साधना अऊ स्वअधयाय में जुड़ गे रेहे हव। (3)स्वामी जी के समाज सेवा मा सम्पर्ण :- सन 1957 मा रामकृष्ण मिशन के महाध्यक्ष स्वामी शंकरानंद हा तुलेंद्र ला ब्रम्हचर्य मा दीक्षित करिस अऊ वोला नवा नाव स्वामी तेज चैतन्य दिस। अपन आप मा निरन्तर विकास अऊ साधना सिद्धि बर हिमालय मा स्थित स्वर्गाश्रम मा एक वर्ष ले कठिन साधना कर के वापस रइपुर आय हव। आपमन रइपुर में स्वामी विवेकानद आश्रम के निर्माण कार्य ला शुरुवात करे हव। ये काम बर आपमन ला मिशन ले कोई स्वीकृत नई मिलिस तभो ले आपमन के प्रयास अऊ मेहनत से रामकृष्ण मिशन बेल्लूर मठ से संबद्धता प्राप्त होइस। स्वामी भास्करेश्वरानंद के सानिध्य मा आपमन संस्कार के शिक्षा ग्रहण करे हव, यही आपमन ला स्वामी आत्मानन्द के नाव मिलिस हे। (4) स्वामी जी के अन्य कार्य:- आदिवासी मन ला उचित सम्मान, ठग मन ले बचाय बर अऊ वोकर मन के उपज मन के सही मूल्य दिलाय बर अबूझमाड़ प्रकल्प के स्थापना करे हव। नारायणपुर मा वनवासी सेवा केंद्र प्रारम्भ करेव जेमा वनवासी मन के दशा अऊ दिशा सुधारे के प्रयास होइस हे। खेती के संगेसंग पेयजल, शिक्षा, चिक्तिसा के कार्य भी होय लागिस। वनवासी छात्र मन बर आवासीय विद्यालय के साथ अन्य विद्यालय के निर्माण अऊ छात्रावास के निर्माण भी करे हव, आपमन ला यूनिसेफ ले आर्थिक मदद भी मिलिस हे। नागपुर मा सेवा संस्था के शुभारम्भ भी करेव, आपमन के द्वारा अध्ययन करे हुए छात्र मन बड़े बड़े प्रशासनिक पद मा चयनित होय हाबय। 27 अगस्त 1989 के दिन भोपाल के सड़क मार्ग के द्वारा रइपुर आवत रेहेव ता राजनाँदगाँव के समीप सड़क दुर्घटना मा आपमन के दुःखत निधन होंगे। (5) स्वामी आत्मानंद जी के भाई :- आपमन के 4 भाई होथव जेमा छोटे भाई प्रसिद्ध भाषाविद अऊ विवेक ज्योति के संस्थापक डॉक्टर नरेंद्र देव वर्मा स्वामी जी जीवन काल मा ही स्वर्ग सिधार गे रिहिस, शेष 3 भाई मा स्वामी त्यागनंद जी महाराज अपन बड़े भाई के रस्ता में चलत हुए इलाहाबाद रामकृष्ण के प्रमुख हाबय। स्वामी निखिलात्मकानंद जी महाराज छतीसगढ़ के वनवासी क्षेत्र मा शिक्षा संस्कार के ज्योति जलावत नारायणपुर आश्रम के प्रमुख हराय। सबके छोटे भाई डॉक्टर ओम प्रकाश वर्मा शिक्षाविद हे अऊ विवेकानंद विद्यापीठ रइपुर के प्रमुख हे।
रानी दुर्गावती

रानी दुर्गावती

12-Sep-2018
महारानी दुर्गावती रानी दुर्गावती के जन्म 5 अक्टूबर सन 1524 के महोबा मं हांय रहिस। दुर्गावती के पिता महोबा के राजा रहिस। रानी दुर्गावती सुन्दर, सुषील, विनम्र, योग्य अउ साहसी लइका रहिस। महारानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्ति सिंह चंदेल के एक एके ठन एकलउतीन बेटी रहिस। बांदा जिला के कालिंजर किला मं 1524 ईसवी के दुर्गा अष्टमी के जन्म के कारण उनकर नाम दुर्गावती रखे गइस। नाम के अनुरूप वोहर तेज, साहस, अउ सुन्दर होए के कारण इनकर प्रसिद्धि सबो डहर फइल गे रहिस। दुर्गावती के मइके अउ ससुराल पक्ष के जाति अलग रहिस। तभो ले दुर्गावती के प्रसिद्धि ले प्रभावित होके गोंडवाना सम्राज के राजा संग्रामष्षाह मंडावी संग विहाव करके उनला अपन पुत्र के वधू बनाइन। दुर्भागवष विहाव के चार बछर बाद राजा दलपत षाह के निधन हो गइस। वो बेरा दुर्गावती के गोद मं तीन बछर के नरायण रहिस। वो बेरा रानी ह स्वयं गढ़ मंडला के षासन संभाले लेय रहिन। उनमन केउ ठक मठ, कुंआ, बावली अउ धर्मषाला बनवाइन। वर्तमान जबलपुर उनकर राज के केन्द्र रहिस। उनमन अपन दासी के नाम मं दासी तलाव, चेरी के नाम मं चेरी तलाव, अपन नाम मं रानी तलाव अउ अपन विष्वासी दीवान आधार सिंह के नाम मं आधार ताल बनवाइन। महारानी दुर्गावती के सुषासन के सांथ पंद्रह बछर तक गोंडवाना मं राज रहिस। बिहाव के होय ले एक बछर बाद दुर्गावती के एक पुत्र होइस। जेकर नाम वीर नारायण रखे गेइस। जेन बेरा वीर नारायण केवल तीन बछर के रहिस वोकर पिता दलपत षाह के मृत्यु हो गईस। दुर्गावती के उूपर दुख के पहाड़ टूट परिस। परन्तु वोहर बड़ा धैर्य अउ साहस के संग ये दुःख पिरा ल सहन करिस। दलपतिष्षाह के मृत्यु के बाद उनकर पुत्र वीर नारायण गद्दी म बैइठिस। रानी दुर्गावती वोकर संरक्षिका बनिस अउ राज काज ल स्वयं देखिस समारिस। उन सदैव प्रजा के दुःख सुख के ध्यान रखत रहिन। चतुरा अउ बुद्धिमान मंत्री आधार सिंह के सलाह अउ सहयोग ले रानी दुर्गावती ह अपन राज्य के सीमा बढ़ाइस। राज्य के संगे-संग वोहर साज बाज के संग अपन सेना घलव बनाइन। उन अपन वीरता, उदारता, चतुरई ले राज, नीति, एकता स्थापित करिन। गोंडवाना राज्यष्षक्ति षाली अउ संपन्न राज्य मन मं गिने जावत रहिस। जेकर ले दुर्गावती के ख्याति फइल गेय रहिस। रानी दुर्गावती के ये सुखी अउ सम्पन्न राज्य मं मालवा के मुसलमानष्षासक बाज बहादुर ह केउ बेर हमला करिस, फेर हर हर खेप वोहर पराजित होइस। रानी दुर्गावती ह अपन पहली युद्ध मं जीत के भारत वर्ष मं अपन नाम रोषन कर लेय रहिस। वीरांगना रानी दुर्गावती षेरषाह के मौत के बाद सूरत खान ह उनकर कारभार बोहस जेन वो बेरा मालवा गणराज्य मंष्षासन करत रहिस। सूरत खान के बाद वोकर पुत्र बाजबहादुर कमान अपन हाथ मं लेइस। जेन रानी रूपमती संग पे्रम करे खातिर प्रसिद्ध होय रहिस। सिंहासन मं बइठते छन बाजबहादुर ल एक महिलाष्षासक नई झेलाइस। वोला हरवाना ल चुटकी के खल जानिस। एकरे सेती वोहर रानी दुर्गावती के गोंड साम्राज्य म धावा बोल देइस। बाज बहादुर के रानी दुर्गावती ल कमजोर समझना भारी भूल परिस। इही कारण वोला भारी हार के सामना करना परिस। ओकर कतको सैनिक घायल हो गइन। बाज बहादुर के खिलाफ ये जंग मं जीत के कारण पास परोस के राज्य मं रानी दुर्गावती के डंका बाज गईस। अब रानी दुर्गावती के राज्य ल पाय के हर कोई सपना देखे लगिन। जेन मं एक मुगल सूबेदार अब्दुल माजिद खान घलव रहिस। अब्दुल माजिद आसफ खान कारा मणिकपुर के शासक रहिस। जे रानी के नजदीक के राज्य रहिस। जब वो रानी के खजाना के बारे मं सुनिस त पगला गे। वो राज मं चढ़ाई करे बर विचार करे लागिस। रानी दुर्गावती के योग्यता अउ वीरता के प्रषंसा अकबर हर सुनिस। वोकर दरबारी मन वोला गोंडवाना ल अपन अधीन कर लेय के सलाह देय लगिन। उन आसफ खां नाम के सरदार ल गोंडवाना के गढ़ मंडला म चढ़ाई करे के उपाय बता देइन। अकबर अउ दुर्गावती तथा कथित महान मुगल षासक अकबर घलव राज्य ल जीत के रानी ल अपन खेमा मं मिला के रखना चाहत रहिस। एकर बर वोहर पैंतरा बाजी शुरु कर देईस। वो रानी के प्रिय सफेद हाथी सरमन अउ उनकर विष्वापात्र मंत्री आधार सिह ल भेंट के रूप मं अपन पास भेजे के आदेष कर देइस। रानी ये मांग ल ठुकरा देइस। एकर उपर अकबर ह अपन एक झन रिष्तेदार आसफ खाॅन के अगुवानी मं गोंडवाना उपर हमला करे के आदेष कर देइस। एक बेर तो आसफ खाॅ पराजित होगे, फेर दूसर खेप वोहर दुगुना सेना अउ तइयारी के संग हमला बोल देइस। दुर्गावती मेंर वो बेरा बहुत कम सैनिक रहिन। उन जबलपुर के पास ‘नरई नाला’’ के किनारे मोर्चा लगाइन अउ स्वयं पुरुष वेष मं युद्ध के नेतृत्व करे लागिन। ये युद्ध मं 3,000 मुगल सैनिक मारे गईन। रानी के घलव अपार क्षति होइस। अगले दिन 24 जून 1564 के मुगल सेना हर फेर हमला बोल बोल देइस। आज रानी के पक्ष दुर्बल रहिस। अनहोनी ल जान के रानी ह अपन पिलवा पुत्र नारायण ल सुरक्षित स्थान मं भेजवा देइस। तभे एक ठन तीर उनकर भुजा मं आके लग गे। रानी ह वोला निकाल के फेंक देइस। तुरते दूसर तीर ह उनकर आंखी मं बेध देइस। रानी ह इहू ल निकालिस फेर वोकर नोक आंखिच मं फंस के रहिगे। तइसने तीसर तीर आके उनकर गर्दन मं धंस गे। रानी ह अंत समय जान के मंत्री अधार सिंह ल कहिस अपन तलवार ले उनकर गर्दन ल काट देवय। फेर वोहर एकर बर तइयार नई होइस। त स्वयं रानी अपने कटार ल हेर के अपन सीना मं भोंक लेइस। आत्म बलिदान के पथ मं आगू बढ़ गे। महारानी दुर्गावती ह ए ले किसम अकबर के सेना सेनापति आसफ खान संग लड़त अपन आत्म उत्सर्ग कर देइस।
छत्तीसगढ़ राज के पहली सपना देखइया डॉ खूबचंद बधेल

छत्तीसगढ़ राज के पहली सपना देखइया डॉ खूबचंद बधेल

12-Sep-2018
डाॅ. खूबचंद बघेल डाॅ. खूबचंद बघेल का जन्म 19 जुलाई 1900 के पथरी गाॅव म होइ रिहिस। छत्तीसगढ़ के कृषक पुत्र, व्यवसाय के चिकित्सक होय के बाद घलव डाॅ. खूबचंद बघेल संस्कार ले कृषक रहिस। उन छत्तीसगढ़ के कृषक जीवन ल नवा दृष्टि देय के अद्वितीय काम करिन। डाॅ. खूबचंद बघेल कृषि ल उद्योग के रूप मं स्थापित करे के परिकल्पना करिस। डाॅ. बघेल छत्तीसगढ़ के किसान अउ आदिवासी आन्दोलन के पे्ररणा स्त्रोत रहिन। डाॅ. बघेल नागपुर ले चिकित्सा के पढ़ाई पूरा करिन। एकर पाछू उन राष्ट्र्ीय आन्दोलन म सक्रिय भागीदारी निभाय लगिन। महात्मा गांधी ले प्रभावित होके उन गाॅव-गाॅव जाके असहयोग आन्दोलन के प्रचार करिन। 1930 म जब महात्मा गांधी नमक सत्याग्रहष्षुरू करिन त उनष्सरकारी नौकरी छोंड़ के उनमा षामिल होय के फैसला करिन। 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह म उन तिसरइया बेर जेल गइन। 1942 म एक बेर फेर भारत छोड़ो आन्दोलन मंष्षामिल होय के कारण उनला अढ़ाई बछर के सजा होइस। 1951 में राष्ट्र्ीय कांग्रेस में मतभेद की वजह से आचार्य कृपलानी के नेतृत्व मं किसान मजदूर पार्टी बनिस। उन ये पार्टी मं षामिल हो गइन। डाॅ. बघेल 1951 ले 57 और फिर 62 के चुनाव मं विजयी होइन। 1967 मं कांग्रेस मं वापसी के बाद उन राज्य सभा बर चुने गइन। छत्तीसगढ़ ल पृथक राज्य बनाय के मांग बर 1956 मं ‘छत्तीसगढ़ महासभा’ के राजनादगाॅव मं आयोजन करे गइस। 1967 म राज्य सभा सदस्य डाॅ. खूबचंद बघेल ह ये विचार-धारा ल जन-आन्दोलन के रूप देइन अउ रायपुर मं ‘छत्तीसगढ़ भ्रातृसंघ’’ के गठन करिन। उनकर एकमात्र संकल्प छत्तीसगढ़ ल राज्य बनाना रहिस। फेर 22 फरवरी 1969 के डाॅ. खूबचंद बघेल जी के निधन हो गईस। उनकर रचना हें - उॅच-नीच अउ छत्तीसगढ़ का स्वाभिमान। नरवा, गरवा, घुरुवा अउ बारी। कांग्रेस बंचाही इनला संगवारी।। रायपुर/स्व. खूबचंद बघेल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के जन्म स्थल ग्राम पथरी ले पूरा प्रदेष मं ग्राम चैपाल शुरू करे गईस। छत्तीसगढ़ प्रदेष मं ग्राम चैपाल अउ जयंती कार्यक्रम के आयोजन करे गइस। जयंती कार्यक्रम ल संबोधित करत प्रदेष कांग्रेस अध्यक्ष भूपेष बघेल ह ’’नरवा नाला, गरवा गाय, घुरवा जैविक खाद अउ बारी खेती संग ग्रामीण विकास बर महत्व बात बताइन। उन कहिन के, छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वप्न द्रष्टा डाॅ. खूबचंद बघेल के सोच के विपरीत भाजपा सरकार काम करे हे। किसान मन ले करे गेय वादा के अनुरूप न तो किसान मनके एक एक दाना खरीदी करिस अउ न ही बोनस देइस हे। श्री बघेल हर कहिस के, कांग्रेेस नरवा, गरवा, घुरूवा और बाड़ी के महत्व ल समझत हे। हमर सरकार बनही त नरवा मनला फेर जिंदा करके जल संचय करे जाही। जेखर ले सिंचाई के काम लेय जाही, जेमा जल स्तर घलव बाढ़ही। गरवा बर श्री बघेल बताइन के हमार सरकार के पहली प्राथमिकता होही के, गोठान ल विकसित करना, पषु मनला निःषुल्क चारा अउ पानी के व्यवस्था करे जाही। एखर ले गोबर गेस प्लांट ल बढ़ावा मिलही। किसानन ल मुफ्त मं गोबर गैस मिल सकही। पषु मनके नस्ल सुधार के कार्यक्रम जोर षोर से चलाय जाही। ताकि, किसान मनके रूझान पषु पालन बर बाढ़य। अउ दूध ले किसानन के आय बढ़़ाय जा सकही। श्री बघेल मन बाड़ी खेती ल बढ़ावा देय खातिर बताइस, किसानन के दाना दाना हमार सरकार खरीदी करही, हर साल किसान मनला बोनस देही। कृषि उपज आधारित उद्योग के स्थापना ल प्राथमिकता के आधर म स्थापित करवाही। ताकि, किसान मनके फसल के सहीं कीमत मिल सकै। कार्यक्रम मं किसान मनके द्वारा पूछे गेय सवाल के जवाब देवत बताइन के, हमारी सरकार प्रत्येक गांव के स्कूल ल माॅडल स्कूल बनाहीं। प्राइवेट स्कूल ले अच्छा षिक्षा मुहैया कराही। षिक्षक मनके खाली पद म तत्काल भर्ती करे जाही। षिक्षक मनला उच्चतम वेतन अउ सुविधा देय जाही। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा शराब बेचे के जवाब मं बघेल बताइस के, कांग्रेस पूर्णष्षराब बंदी के प्रस्ताव पास कर चुके हे। श्री बघेल के कहना हे, कांगे्रस के सरकार बनते किसान मनके कर्जा माफ करे जाही। अउ बिजली बिल हाफ करे जाही। हमार सरकार किसान मजदूर के सरकार होही। हमार द्वारा गउ पालक राउत भाई मनला मनरेगा मजदूरी के तहत काम देय जाही। गांधी जी के ग्रामीण अर्थ व्यवस्था ल साकार करे अउ मजबूत बनाय बर ये योजना मान0 भूपेष बघेल जी द्वारा बताय गेय हे। जेकर ले गांव गांव मं आर्थिक क्रंाति अउ समृद्धि आही। गांव के षिक्षा, स्वास्थ्य समेंत जमों किसम के विकास होही। आज ले ये कार्यक्रम पूरा प्रदेष मं करे जाही।
शहीद वीर नारायण सिंह

शहीद वीर नारायण सिंह

12-Sep-2018
शहीद वीर नारायण सिंह बिंझवार जन-जाति के वीर नारायण सिंह के जन्म सोना खान जि.बलौदा बाजर मं होय रहि। पिता रामराय सोना खान के जमींदार रहिस। पिता रामराय ह 1818-19 के बेरा अंग्रेज अउ भोसला मनके विरूद्ध विद्रोह करिस। फेर नागपुर के कैप्टन मैक्सन ये विद्रोह ल दबा देइस। पिता रामराय के स्वर्ग सिधारे के बाद 1830 मं नारायण सिंह जमींदार बनाय गइस। परोपकारी प्रवृत्ति के कारण नारायण सिंह गाॅव-गाॅव जाके लोगन के समस्या ल दूर करत रहय। वो बेरा तालाब निर्माण, वृक्षारोपण जइसन जन-कल्याण के काम करय। गुरतुर भाखा, मिलनसार, धरम करम के मनइया नारायण सिंह मं एक आदर्ष जमींदार के सरी गुण रहिस। 1856 में छत्तीसगढ़ दूबी तक नई उल्हिस अइसन भीषण सूखा के चपेट मं आगे। लोगन दाना-दाना बर तरसे लगिन। फेर गाॅव के व्यापारी माखन के गोदाम अनाज ले भरे रहिस। नारायण सिंह ल जनता के एकिसम भूखे मरत देखे नई जा सकिस। वोहर अनाज भंडार के ताला ल टोर डारिस। व्यापारी माखन के षिकायत म इलियट ह वीर नारायण सिंह के विरूद्ध वारंट जारी कर देइस। 24 अक्टूबर 1856 के उनला संबलपुर मं गिरफ्तार कर लेय गइस। 28 अगस्त 1857 के नारायण सिंह अपन तीन सांथी मनके संग जेल ले भगा गें। नारायण सिंह सोना खान पहुंच के 500 बंदूक धारी मनके एक ठन सेना बना लेइस। उनला गिरफ्तार करना अंग्रेज मन बर प्रतिष्ठा के प्रष्न बन गे। नारायण सिंह ह सोना खान ले अंग्रेज संग जमके विरोध करे लगिस। लेकिन आखरी मं स्मिथ के चाल मं अंग्रेज के सेना ह भारी मसक्कत के बाद उनला पकड़ घालिस। फेर इलियट के अदालत मं उनकर विरूद्ध मुकदमा चलाय गईस। 10 दिसंबर 1857 के दिन नारायण सिंह ल फांसी के सजा सुनाके लटका दिये गईस। वो स्थान ’’जय स्तंभ चैक’’ रायपुर के नाम से आज प्रसिद्ध है। वो दिन ले नारायण सिंह, ’’शहीद वीर नारायण सिंह’’ हो गईस। छत्तीसगढ़ के माटीपुत्र ’’शहीद वीर नारायण सिंह’’ भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम वीर षहीद हें।
शहीद गेंद सिंह

शहीद गेंद सिंह

12-Sep-2018
‘‘शहीद गेंदसिंह’’ छत्तीसगढ़ राज्य के एक प्रमुख क्षेत्र हे बस्तर। अंग्रेज ह अपन कुटिल चाल चलके बस्तर बस्तर अपन षिकंजा मं जकड़ ले रहिस। बस्तर के वनवासी मनके नैतिक, आर्थिक अउ सामाजिक षोषण करत रहिस। एकर से वनवासी संस्कृति के समाप्त होय के खतरा बाढ़त जात रहिस। एकिसम बस्तर के जंगल आक्रोष मं गरमा गेय रहिस। वो दिन परलकोट के जमींदार रहिस श्री गेंद सिंह। वो पराक्रमी, बुद्धिमना, चतुरा अउ न्यायप्रिय व्यक्ति रहिस। उनकर इच्छा रहिस के उनकर क्षेत्र के प्रजा प्रसन्न रहै। उनकर कोनो किसम से षोषण न होवय। एकर बर उन लगाजार हर सम्भव प्रयास करत रहैं। उनकर ये इच्छा मं अंग्रेज के पिट्ठू कुछ जमींदार व्यापारी अउ राजकर्मचारी बाधक बने रहैं। उन सब उनला परेषान करे के प्रयास करत रहंत। परलकोट मं ब्रिटिष अधिकारी मनके जमावड़ा ले अबूझ माड़िया आदिवासी मनला अपन पहिचान नंदाय के खतरा उत्पन्न हो गेय रहिस। परदेषी के हस्तक्षेप से अबूझमाड़िया अपन संस्कृति के प्रति घलव खतरा महसूस करे लगे रहिन। अगे्रज मनके षोषण नीति से अबूझमाड़िया तंग आ चुके थे। गेंद सिंह के माध्यम से अबूझमाड़िया एक अइसन संसार की रचना करना चाहत रहिन के जहां लूट-खसोट अउ षोषण के नाम निसान बिलकुल न होवय। ये विचार उनमं अंग्रेजन के प्रति बदला के भावना के प्रमुख कारण बन गेय रहिस। गेंद सिंह के आव्हान मं अबूझमाड़िया स्त्री-पुरुष परल कोट मं एक जघा जुरे लगीन। अबूझमाड़ी महिला रमोतीन के अगवानी मं धवऱा रूख के डारा ल विद्रोह के संकेत केे रूप मं एक जघा ले दूसर जघा भेजे जात रहिस। पत्ता के सुखाय से पहली वर्ग विषेष ल विद्रोही मन के पास भेजे के उदीम करे जाय। कम समय मं घलव पूरा माड़ अंचल मं मातृ भूमि ल अंग्रेजन के पराधीनता से मुक्त कराय के चिंगारी फैल दे गइ स। कम समय मं पूरा माड़ मं अंग्रेज के खिलाफ नफरत फैल गयी। अबझमाड़ के स्त्री पुरुष मन 24 दिसम्बर 1824 ई. के अंग्रेजन के खिलाफ ‘‘मुक्ति’’ आन्दोलन छेड़ देय रहिन। क्रांतिकारी 4 जनवरी 1825 ई. तक अबूझमाड़ ले चांदा तक छा गेय रहिन। गेंद सिंह के नेतृत्व मं क्रंातिकारी आदिवासी अंग्रेज मनके विरूद्ध ठाड़ हो गे रहिन। जब कभू कउनों अंग्रेज पकड़ मं आजाय त ओकर बुटी बुटी कर डारंय। ये मुक्ति संग्राम के चलउकी अलग-अलग टुकड़ी मं अबूझ माड़िया मन करत रहिन। जेमा महिला मनके घलव बड़ संख्या मं सामिल रहिन। अइसन किसम ले सम्मिलित रूप मं आंदोलन चलावत रहिन हें। रात मं कं्रातिकारी मन घोटुल मनमा इकट्ठा होवत रहंय। आगू दिन उन अंग्रज मनके संग कइसन ढंग ले युद्ध करे जाही एकर बारे मं योजना बनावत रहंुय। क्रंातिकारी मनके प्रमुख लक्ष्य विदेषी सत्ता ल ससन भर के धुर्रा चटवाना अउ परल कोट के संगे संग बस्तर क गुलामी ले मुक्ति देवाना रहिस। गेंद सिंह के आन्दोलन ले छत्तीसगढ़ के अंग्रेज अधीक्षक एग्न्यू घबड़ा कांप गय रहिस। गेंद सिंह के अइसन आन्दोलन ल अंगे्रजन विद्रोह मानत रहय। जेकर दमन करे बर एगन्यू ह चांदा के पुलिस अधीक्षक केप्टन पेव ले मदद मांगिस। केप्टन पेव ह अंग्रेजी सेना के बल मं परील कोट के कं्रातिकारी मनके संग मं युद्ध करिस। जेन बेरा लगातार अट्ठारा दिन तक 24 दिसंबर ले 10 जनवरी 1825 तक क्रंातिकारी अउ अंग्रेज मनके बीच युद्ध चले रहिस। ये लड़ाई मं गैंद सिंह के द्वारा जैविक युद्ध करे जाय के घलव प्रमाण मिलथे। जिनमा इनकर द्वारा मंत्र तंत्र के षक्ति ले मछेव ’’मधु मक्खी’’ के आवाहन करे जावय अउ उनला अंगे्रज अउ मराठा सैनिक मनके उूपर छोंड़ देय जावत रहय। अंग्रेज अउ मराठा सैनिक मनला काट खावंय। उनला मधु मक्खी मनके कटई के मारे मैदान छोंड़ के भागतेच दिखय। उन आगू नई बढ़ पात रहंय। जेकर सेती गैंद सिंह ल युद्ध करे खातिर बने मउंका मिल जावत रहय। युद्ध मं कउनों पुरुष सिपाही गिर मर जांय त महिला सिपाही मनके द्वारा युद्ध चालू रखे जावै। फेरष्पुस्तैनी षस्त्र के धरे रहे के कारण अबूझ माड़िया अंग्रेज मनन के आधुनिक षस्त्र के आगू टिक नई पाईन। अंत मं उनकर पराजय होगे। 10 जनवरी तक युद्ध चले के बाद समाप्त होगे। अंग्रेज मन आखिर गेंद सिंह ल पकड़ डारिन। गंेद सिंह उपर अंग्रेज मनन झूंठ मंूठ के मुकदमा चलाइन। 20 जनवरी 1825 ई. के अंग्रेज मन गेंद सिंह ल ओकरे महल किला के आगूच मं फंासी लगा देइन। गैंद सिंह के बलिदान परल कोट के धरती के मुक्ति अउ बस्तर के अस्मिता के रक्षा के रक्षा मं परान तजे के एक सुरता राखे के लाइक उदाहण अउ अध्याय हे। गेंद सिंह ह अपन स्वाभिमान अउ मातृ भूमि के रक्षा अउ गुलामी ले मुक्ति के आंदोलन चलाय रहिस। गेंद सिंह के उत्सर्ग काल के निष्कर्ष ले निकरे एक स्वर्ण रेखा बरोबर हे। अंग्रेजन के विरूद्ध स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम षंखनाद करइया गैंद सिंह के आत्मोत्सर्ग अनूठा अउ अविस्मरणीय हे। हल्बा आदिवासी समाज संपूर्ण छत्तीसगढ़़ के माथा इस तथ्य के बोध ले गर्व ले उठे हुए हे। जेन बस्तर जइसन पिछडे़ आदिवासी बहुल अंचल मं स्वतंत्रता के चेतना के प्रथम बीजा रोपण गैंद सिंह जी ह करे हे। गैंद सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम बर बस्तर अउ छत्तीसगढ़ समेंत पूरा राष्ट के प्रथम षहीद माने मं बढ़ा चढ़ा के कहना नई हो सकय। राष्ट भक्ति अउ स्वाभिमान के रक्षा के पे्ररणा ग्रहण करना ही देश के प्रथम शहीद गेंद सिंह के प्रति सिरतोन श्रद्धांजलि होही।
सुराजी वीर अनंतराम बर्छिहा

सुराजी वीर अनंतराम बर्छिहा

10-Sep-2018
सुराजी वीर अनंतराम बर्छिहा
 
सत् मारग म कदम बढ़ाके, देश-धरम बर करीन हें काम।
वीर सुराजी वो हमर गरब आय, नांव जेकर हे अनंतराम।।
 
देश ल सुराज देवाय खातिर जे मन अपन जम्मो जिनिस ल अरपन कर देइन, वोमन म अनंतराम जी बर्छिहा के नांव आगू के डांड़ म गिनाथे। वो मन सुराज के लड़ाई म जतका योगदान देइन, वतकेच ऊँच-नीच, छुआ-छूत, दान-दहेज आदि के निवारण खातिर घलोक देइन, एकरे सेती एक बेरा अइसे घलोक आइस के अनंतराम जी ल अपन जाति-समाज ले अलग घलोक रहे बर लागिस। अछूतोद्धार के कारज खातिर गाँधी जी ह छत्तीसगढिय़ा गाँधी के नांव ले विख्यात पं. सुंदरलाल जी शर्मा के संगे-संग जम्मो छत्तीसगढ़ ल अपन गुरु मानिन, त एमा अनंतराम बर्छिहा जइसन मन के घलोक योगदान हवय।
 
अनंतराम जी बर्छिहा के जनम छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर ले करीब 24 कि.मी. दूरिहा म बसे गाँव चंदखुरी म 28 अगस्त सन् 1890 म होए रिहिसे। ए मेर ये जानना जरूरी हवय के रायपुर के उत्ती दिशा म बसे ये चंदखुरी ह उही ऐतिहासिक गाँव आय, जेला हमन दुनिया के एकमात्र कौशिल्या मंदिर खातिर जानथन। अनंतराम जी के माता के नांव यशोदा बाई अउ पिता के नांव हिंछाराम जी बर्छिहा रिहिसे।
 
अनंतराम जी के लइकई उमर के नांव नंदा रिहिसे। उंकर सियान हिंछाराम जी कुल 15 एकड़ खेती के जोतनदार रिहिन हें, एकरे सेती घर के आर्थिक स्थिति थोरुक कमजोर रिहिसे। बाबू नंदा ल चौथी कक्षा के बाद अपन पढ़ाई ल छोड़े बर परगे, अउ एकरे संग वो ह नांगर-बक्खर अउ खेती-किसानी म भीडग़े। इही बीच उंकर सियान सरग के रस्ता चल देइन। अब अतेक बड़ परिवार के जोखा-सरेखा नंदा के खांध म आगे, तेमा अकाल-दुकाल के मार। वो अइसे सुने रिहिसे के व्यापार करे म लछमी के आवक जल्दी होथे, एकरे सेती वो खेती के संगे-संग छोटकुन दुकान घलोक चालू करीस। तीर-तखार के गाँव मन म काँवर म समान धरके घलोक जावय। वोकर मेहनत अउ ईमानदारी ह रंग लाइस, अउ देखते-देखत वो बड़का बैपारी के रूप म अपन चिन्हारी बना डारिस। सिरिफ तीरे-तखार के गाँवेच भर म नहीं भलुक दुरिहा के गाँव मन म घलोक वोकर नांव के डंका बाजे लागिस।
 
सन् 1920 के बात आय। जब गाँधी जी रायपुर आइन त उंकर दरस करे के साध कर के बर्छिहा जी रायपुर आइन, अउ गाँधी जी के वाणी ल सुन के वो गाँधी जी के अनुयायी बनगें। वो बेरा ह तो स्वतंत्रता संग्राम के बेरा रिहिसे। पूरा देश म एकर लहर चलत रिहिसे, तेकरे सेती जम्मो मनखे के मन म कोनो न कोनो किसम ले सुराज के भावना मन रहिबे करय, त भला अनंतराम वो लहरा ले कइसे बांचे सकत रिहिसे। छत्तीसगढ़ अंचल लोकमान्य तिलक के आंदोलन ले प्रभावित हो चुके रिहिसे। पं. माधवराव सप्रे ह सन् 1900 म 'छत्तीसगढ़ मित्रÓ के प्रकाशन चालू कर डारे रिहिसे। 1903 म भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्थापना रायपुर म होगे रिहिसे। सन् 1907 म स्वदेशी जिनिस मनके दुकान खुलगे रिहिसे। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती 'सामाजिक असमानताÓ के खिलाफ संघर्ष करत बिलासपुर तक आगे रिहिन हें।
 
एकर प्रभाव पूरा छत्तीसगढ़ म परत रिहिसे। अइसन म युवा अनंतराम के मन म ए सबके प्रभाव कइसे नइ परतीस? बर्छिहा जी के अपन कुर्मी जाति समाज तो पहिलीच ले ए मारग म आगू बढ़ चुके रिहिसे। गाँधी जी के आगमन तो ये सुलगत आगी म घीव के कारज करीसे। अइसन म बर्छिहा जी भला कहाँ पाछू रहितीन, उहू मन अपन दुकानदारी के जम्मो काम-काज ल अपन छोटे भाई सुखराम बर्छिहा के खांध म सौंप के राष्ट्रीय आंदोलन म कूद गें।
 
सन् 1923 म नागपुर म झंडा सत्याग्रह चालू होइस। छत्तीसगढ़ के जम्मो खुंट ले सत्याग्रही मन नागपुर पहुंचे लागिन। वो सत्याग्रह म भाग लेके छै-छै महीना के सजा घलोक काट आइन। बर्छिहा जी के ये पहली जेल यात्रा रिहिसे, जेला उन नागपुर केंद्रीय जेल म काटिन। वोकर बाद तो उन घर-बार ल छोड़ के गाँव-गाँव अलख जगाये लागिन। एकर सेती उनला सन् 1930 म एक पइत फेर एक बछर के सजा होइस। सन् 1930 के आंदोलन के केंद्र चंदखुरी च गाँव ह बनगे रिहिसे, जेकर प्रसिद्धि पूरा देश भर म होए रिहिसे। वो गाँव के मन अनंतराम बर्छिहा के अगुवई म असहयोग आंदोलन म बड़का भूमिका निभाए रिहिन हें। गाँव-गाँव जाके विदेशी जिनिस मनके बहिष्कार के बात करयं, वो जिनिस मनके होरी बारयं, छुआछूत मिटाए के बात करयं, खादी ग्रामोद्योग के प्रचार करयं, सहभोज के आयोजन करयं, बीमार मनखे मन के सेवा करयं, उनला दवई बांटंयं, गाँव के साफ-सफाई करयं, नान्हें लइका मनला पढ़े खातिर  प्रोत्साहित करयं।
 
चंदखुरी गाँव वो बखत राष्ट्रीय आंदोलन के गढ़ बनगे रिहिसे। अइसे म  फिरंगी शासन कब तक कलेचुप बइठे रहितीस? गाँव म पुलिस के घेरा डार दिए गेइस। एक बटालियन पुलिस उहां तैनात कर दे गइस। फेर वो पुलिस वाला मनके गुजारा होतिस कइसे? सरकारी व्यवस्था के खिलाफ म तो आंदोलन होवत रिहिसे। पुलिस वाले मनला मांगे म कोनो आगी-पानी तक नइ देवत रिहिन हें। बर्छिहा जी के दुकान म बिसाए म घलोक कोनो समान नइ मिलत रिहिसे। अइसन म पुलिसवाला अउ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन के आपस म ठनना स्वभाविक रिहिसे। ए बगावत के असर आसपास के अउ आने गाँव मन म घलोक बगरत जावत रिहिसे।
एकर जानकारी जिला के अधिकारी मन जगा घलोक पहुंचीस। जिला कप्तान चंदखुरी पहुंचीस अउ उहां के लोगन ल समझाए-बुझाए के उदिम करिस। बर्छिहा जी के दुकान ले समान लेना चाहिस। उंकर जगा संदेश भेजवाइस। जेकर जवाब मिलिस- 'आप हमर इहाँ मेहमान बनके आहू त आपके सुवागत हे, फेर कहूं सरकारी अधिकारी बनके आहू, त आपला हमर असहयोग हे।Ó ए जुवाब ले अधिकारी चिढग़े, अउ पूरा गाँव म कहर मचा देइस। घुड़सवार पुलिस वाला मन पहुंचीन अउ पूरा गाँव ल रौंद डारिन। बर्छिहा जी के दुकान ल लूट डारिन। अतको म उंकर मन नइ माढि़स त घोसना कर डारिन के बर्छिहा जी के दुकान ले जेन कोनो उधारी लिए होहीं वोला वापस झन करे जाय। संग म अनंतराम बर्छिहा के संगे-संग गाँव के अउ सात झनला गिरफ्तार करके जेल भेज देइन। गिरफ्तार लोगन म रिहिन हें- बर्छिहा जी के छोटे भाई सुखराम बर्छिहा, बर्छिहा जी के बड़े बेटा वीर सिंह बर्छिहा, नन्हे लाल वर्मा, गनपतराव मरेठा, हजारीलाल वर्मा, नाथूराम साहू अउ हीरालाल साहू।
बर्छिहा जी के लाखों रुपिया के संपति नष्ट होगे, जेकर निसानी ल आजो देखे जा सकथे। उन सेठ ले फेर फकीर होगे रिहिन हें। तभो ले उनला एक साल के फेर सजा होगे, अउ संग म जुर्माना घलोक लाद देइन। जुर्माना नइ पटाए के सेती उंकर नांगर-बख्खर, गाय-बइला आदि के नीलामी कर दे गइस। बर्छिहा जी के संग ये सिलसिला सन् 1942 तक सरलग चलीस।
 
सन् 1930-32 के जेल यातना ह आज कस सहज नइ रिहिसे। उंकर मन जगा चक्की चलवायं, घानी म बइला के जगा उनला फांद के तेल पेरवायं, पानी के रहट चलवायं। उनला लोहा के बरतन म खाना देवयं, तेल-साबुन के तो नामे नइ रिहिसे। पहिने खातिर एक जांघिया अउ एक बंडी, कनिहा म बांधे खातिर एक ठन पंछा अउ एक ठन टोपी। बिछाए अउ ओढ़े खातिर दू ठन कमरा अउ एक ठन टाटपट्टी। फेर सत्याग्रही मन म कतकों अइसे राहयं, जेन खादी के छोड़ अउ कोनो जिनिस के उपयोगेच नइ करत रिहिन हें। अनंतराम जी घलोक वइसने खादी धारी रिहिन हें, उन दूसर कपड़ा मनला उपयोग नइ करत रिहिन हें, तेकरे सेती जेल म उन नग्न अवस्था म राहयं। सिरिफ लोक मर्यादा खातिर उन एक ठन कमरा ल लपेट ले राहयं। अइसन खादी व्रतधारी रिहिन हें बर्छिहा जी।
 
अब चिटिक उंकर सामाजिक क्रांतिकारी रूप के चरचा। सन् 1933 ह अस्पृश्यता निवारण के इतिहास म बहुते महत्वपूर्ण बछर आय। बाबा साहेब अंबेडकर अउ गाँधी जी के बीच होए पुना पेक्ट के अनुसार अस्पृश्यता के कलंक ल मिटाए खातिर पूरा देश म अभियान चालू करिन। छुआछूत के संगे-संग, कुरीती, गरीबी, अज्ञानता, अशिक्षा ल मिटा के स्वावलंबन के रद्दा देखाइन। ये जम्मो बात बर्छिहा जी के अंतस म उतर आइन। अउ ये जम्मो कारज के शुरुवात उन अपनेच घर ले चालू करीन।
 
वो बखत जम्मो गाँव-घर म छुआछूत के चलन भारी मात्रा म होवत रिहिसे। उन अपनेच गाँव के अइसन जाति कहाने वाला लोगन ल सामाजिक अधिकार देवाए खातिर आंदोलन चलाइन। अइसन जाति-समाज के लोगन मन सार्वजनिक कुंआ ले पानी नइ ले सकत रिहिन हें, वोकर मन खातिर उन अपन घर के कुंआ ल खोलवाइन। मरदनिया मन उंकर हजामत नइ बनावत राहंय, त उन खुद उंकर मनके हजामत बनावयं। धोबी के कारज ल घलोक उन खुदे करयं। उन अस्पृश्यता के खिलाफ आंदोलन चलाइन तेकर सुफल ये होइस के उंकर गाँव के मंदिर ह सबो मनखे खातिर खुलगे। गाँव के वातावरण तो उंकर अनुकुल होगे, फेर वोकर खुद के जाति-समाज के मुखिया मनला ये सब बात नइ सुहाइस, अउ उन बर्छिहा जी के परिवार ल अपन जाति ले बाहिर के रद्दा देखा देइन।
 
उंकर ले रोटी-बेटी के संबंध, पौनी-पसारी के संबंध, घाट-घटौंदा के संबंध जम्मो ल बंद कर दिए गेइस। वो बखत के स्थिति के चित्रण करत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अउ सामाजिक नेता डॉ. खूबचंद बघेल ह लिखे हवयं- 'गाँव के परिस्थिति विस्फोटक होगे रिहिसे। पांचों पवनी माने- नाऊ, धोबी, राउत, मेहर अउ लोहार मन उंकर जम्मो काम-धाम ल छोड़ दिए रिहिन हें। उंकर समाज उंकर संग जम्मो किसम के व्यवहार ल बंद कर दिए रिहिसे, तभो ले बर्छिहा गाँधी जी के आदर्श म चलत मगन राहयं।Ó
 
वो समय तक मनवा कुर्मी समाज म प्रगतिशीलता आए ले धर लिए रिहिसे। बर्छिहा जी के ही विचार ल मानने वाला एक परिवार उंकर बेटी ल अपन बहू के रूप म ले के समाज ले बहिष्कृत होए बर तइयार होगे। फेर बात अतकेच म नइ बनिस। काबर ते बर्छिहा जी के एक ठन अउ संकल्प रिहिसे के 'न तो वो दहेज लेवय, अउ न दहेज देवय।Ó वो ककरो समझाए म घलोक नइ समझत रिहिन हें। तब वो परिवार वाले मन अइसनो खातिर मानगें।
 
बर्छिहा जी के जम्मो शर्त ल मानने वाला परिवार दुरुग जिला के सिलघट नामक गाँव के टिकरिहा परिवार रिहिसे। ये बिहाव के जुराव ल मनवा कुर्मी समाज ल दो भाग म बांट देइस। जुन्ना पीढ़ी ए मन ल सबक सिखाए खातिर त नवा पीढ़ी ए नवा सामाजिक सुधार ल लागू करे खातिर। नवा पीढ़ी के वो बखत मुखियाई करत रिहिन हें- डॉ. खूबचंद बघेल, जगन्नाथ बघेल, दुर्गासिंह सिरमौर, प्रेमतीर्थ बघेल, जयसिंह वर्मा, वीरसिंह बर्छिहा के संगे-संग आने समाज के वो समय के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन, जे मन वो बिहाव के पतरी उठाए ले लेके जम्मो किसम के नेंग-जोंग सबो ल करीन।
 
बर्छिहा जी के बेटी राधबाई ह खादी के साड़ी पहिन के मंडप म बइठिस। भांवर के बाद दहेज के रूप म सिरिफ एक ठन सूत काते के चरखा अउ पानी दे गेइस। अइसन आदर्श बिहाव ये छत्तीसगढ़ अंचल म एकर पहिली कभू नइ होए रिहिसे। आज घलोक अइसन आदर्श के चरचा न तो कहंू सुने ल मिलय अउ न देखे ल। बर्छिहा जी अइसन महापुरुष रिहिन हें, जेन सामाजिक क्रांति के शुरुआत अपनेच घर ले करे रिहिन हें।
 
बर्छिहा जी म संघर्षशीलता के संगे-संग प्रशासनिक क्षमता घलोक रिहिस हे। उन कई बछर तक तहसील कांग्रेस के अध्यक्ष रिहिन। सन् 1937 म अपन अंचल ले विधायक घलोक बनीन। उन जब तक जीइन दीया बनके जीइन, लोगन बर अंजोर करीन। छत्तीसगढ़ महतारी के ये सपूत ह अपन पूरा जीवन ल देश खातिर समरपित कर देइस। 22 अगस्त सन् 1952 के उन ये नश्वर दुनिया ले बिदा ले लेइन।
 
सुशील भोले
41-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 098269 92811
चंदुलाल चंद्रकार

चंदुलाल चंद्रकार

04-Sep-2018
चंदूलाल मेडिकल कॉलेज का 210 करोड़ रुपए में हुआ सौदा, संतोष रूंगटा ग्रुप संभालेगा प्रबंधन प्रदेश का निजी क्षेत्र का पहला मेडिकल कॉलेज चंदूलाल चंद्राकर मेमोरियल मेडिकल कॉलेज को आखिरकार खरीदार मिल ही गया। उसे संतोष रूंगटा ग्रुप ने 210 करोड़ में खरीद लिया। जिसके बाद कॉलेज पर मंडरा रहा तालाबंदी का संकट टल गया है। नीट द्वारा मेडिकल कॉलेज के प्रवेश में मैनेजमेंट कोटा समाप्त होने के बाद से ही चंदूलाल चंद्राकर मेडिकल कॉलेज प्रबंधन वित्तीय संकट में घिर गया था। उसके बाद से वह कॉलेज को बेचने के लिए खरीदार तलाश रहा था। तमिलनाडु की एक शिक्षण संस्था ने इसे खरीदने में रूचि भी दिखाई थी और एडवांस के रूप में कुछ रकम भी भुगतान कर दिया था लेकिन बाद में किसी कारण से उस संस्था ने सौदा निरस्त कर दिया। जिसके बाद शहर के ही संतोष रूंगटा ग्रुप ने मेडिकल कॉलेज को खरीदने सामने आया। दो-तीन दौर की बैठक के बाद चंदूलाल चंद्राकर मेमोरियल मेडिकल कॉलेज प्रबंधन 210 करोड़ में कॉलेज संतोष रूंगटा ग्रुप को बेचने पर सहमति बनी। जिसके बाद नए ग्रुप कॉलेज का संचालन अपने हाथ में लेना शुरू कर दिया है। खर्च 100 करोड़, जनरेट हो रहा था 30 करोड़ रुपए: हर वर्ष संचालन के लिए करीब 100 करोड़ की जरूरत होती है। कोटा समाप्त होने के बाद मिलने वाली फीस से महज 30 करोड़ ही जनरेट हो रहे थे। चंदूलाल चंद्राकर मेडिकल कॉलेज। स्टाफ की कमी को जल्द करेंगे दूर संतोष रूंगटा ग्रुप ने कॉलेज का संचालन हाथ में लेते ही स्टाफ की कमी को दूर करने के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी है। कॉलेज में वर्तमान में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर, सीनियर रेसीडेंट्स और जूनियर रेसीडेंट्स के कई पद खाली है। इनमें अनाटोमी, बायोकेमेस्ट्री, पैथोलॉजी, माइक्रोबायलाजी, फोरेंसिक मेडिसिन, कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के रिक्त पद शामिल हैं। वहीं क्लीनिक्स में जनरल मेडिसिन, टीबी समेत अन्य विभागों में भर्ती की जाएगी। टेकओवर की प्रक्रिया शुरू पहले तामिलनाडु की एक संस्था ने दिया था एडवांस 200 करोड़ रुपए की देनदारी है प्रबंधन पर पुराने प्रबंधन पर बैंक और मार्केट की 200 करोड़ रुपए की देनदारी है। इनमें करीब 150 करोड़ रुपए इंडियन बैंक और सेंट्रल बैंक से लोन के रूप में है। जिनकी हर महीने की ईएमआई ही करीब 4 करोड़ रुपए हो रही है। 3 महीने से अधिक समय ईएमआई का भुगतान नहीं हुआ था। जबकि तीन महीने तक भुगतान नहीं होने की स्थिति में बैंक प्रबंधन ऐसे खातों को एनपीए में डाल सकता है। वहीं स्टाफ को वेतन भी भुगतान नहीं हो पा रहा था। इसके चलते कॉलेज में तालाबंदी की नौबत आ गई थी। कॉलेज के बिकने से यह संकट टल गया। चंदूलाल मेडिकल कॉलेज खरीदने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद टेकओवर की प्रक्रिया शुरू हो गई। एक-एक कर विभागों का संचालन अपने हाथों में ले रहे हैं। स्टाफ की कमी को दूर करने के लिए नई भर्ती कर रहे है। सोनल रूंगटा, डायरेक्टर, संतोष रूंगटा ग्रुप प्रवेश निरस्त होने से गड़बड़ाई व्यवस्था शिक्षा सत्र 2017-18 से सरकार ने मैनेजमेंट कोटा समाप्त कर दिया। जिस दिन आदेश जारी हुआ उसके पहले ही चंदूलाल चंद्राकर मेडिकल कॉलेज में मैनेजमेंट सीट के लिए प्रवेश की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। इसके चलते विद्यार्थियों को सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी।