शहीद गेंद सिंह

शहीद गेंद सिंह

12-Sep-2018
‘‘शहीद गेंदसिंह’’ छत्तीसगढ़ राज्य के एक प्रमुख क्षेत्र हे बस्तर। अंग्रेज ह अपन कुटिल चाल चलके बस्तर बस्तर अपन षिकंजा मं जकड़ ले रहिस। बस्तर के वनवासी मनके नैतिक, आर्थिक अउ सामाजिक षोषण करत रहिस। एकर से वनवासी संस्कृति के समाप्त होय के खतरा बाढ़त जात रहिस। एकिसम बस्तर के जंगल आक्रोष मं गरमा गेय रहिस। वो दिन परलकोट के जमींदार रहिस श्री गेंद सिंह। वो पराक्रमी, बुद्धिमना, चतुरा अउ न्यायप्रिय व्यक्ति रहिस। उनकर इच्छा रहिस के उनकर क्षेत्र के प्रजा प्रसन्न रहै। उनकर कोनो किसम से षोषण न होवय। एकर बर उन लगाजार हर सम्भव प्रयास करत रहैं। उनकर ये इच्छा मं अंग्रेज के पिट्ठू कुछ जमींदार व्यापारी अउ राजकर्मचारी बाधक बने रहैं। उन सब उनला परेषान करे के प्रयास करत रहंत। परलकोट मं ब्रिटिष अधिकारी मनके जमावड़ा ले अबूझ माड़िया आदिवासी मनला अपन पहिचान नंदाय के खतरा उत्पन्न हो गेय रहिस। परदेषी के हस्तक्षेप से अबूझमाड़िया अपन संस्कृति के प्रति घलव खतरा महसूस करे लगे रहिन। अगे्रज मनके षोषण नीति से अबूझमाड़िया तंग आ चुके थे। गेंद सिंह के माध्यम से अबूझमाड़िया एक अइसन संसार की रचना करना चाहत रहिन के जहां लूट-खसोट अउ षोषण के नाम निसान बिलकुल न होवय। ये विचार उनमं अंग्रेजन के प्रति बदला के भावना के प्रमुख कारण बन गेय रहिस। गेंद सिंह के आव्हान मं अबूझमाड़िया स्त्री-पुरुष परल कोट मं एक जघा जुरे लगीन। अबूझमाड़ी महिला रमोतीन के अगवानी मं धवऱा रूख के डारा ल विद्रोह के संकेत केे रूप मं एक जघा ले दूसर जघा भेजे जात रहिस। पत्ता के सुखाय से पहली वर्ग विषेष ल विद्रोही मन के पास भेजे के उदीम करे जाय। कम समय मं घलव पूरा माड़ अंचल मं मातृ भूमि ल अंग्रेजन के पराधीनता से मुक्त कराय के चिंगारी फैल दे गइ स। कम समय मं पूरा माड़ मं अंग्रेज के खिलाफ नफरत फैल गयी। अबझमाड़ के स्त्री पुरुष मन 24 दिसम्बर 1824 ई. के अंग्रेजन के खिलाफ ‘‘मुक्ति’’ आन्दोलन छेड़ देय रहिन। क्रांतिकारी 4 जनवरी 1825 ई. तक अबूझमाड़ ले चांदा तक छा गेय रहिन। गेंद सिंह के नेतृत्व मं क्रंातिकारी आदिवासी अंग्रेज मनके विरूद्ध ठाड़ हो गे रहिन। जब कभू कउनों अंग्रेज पकड़ मं आजाय त ओकर बुटी बुटी कर डारंय। ये मुक्ति संग्राम के चलउकी अलग-अलग टुकड़ी मं अबूझ माड़िया मन करत रहिन। जेमा महिला मनके घलव बड़ संख्या मं सामिल रहिन। अइसन किसम ले सम्मिलित रूप मं आंदोलन चलावत रहिन हें। रात मं कं्रातिकारी मन घोटुल मनमा इकट्ठा होवत रहंय। आगू दिन उन अंग्रज मनके संग कइसन ढंग ले युद्ध करे जाही एकर बारे मं योजना बनावत रहंुय। क्रंातिकारी मनके प्रमुख लक्ष्य विदेषी सत्ता ल ससन भर के धुर्रा चटवाना अउ परल कोट के संगे संग बस्तर क गुलामी ले मुक्ति देवाना रहिस। गेंद सिंह के आन्दोलन ले छत्तीसगढ़ के अंग्रेज अधीक्षक एग्न्यू घबड़ा कांप गय रहिस। गेंद सिंह के अइसन आन्दोलन ल अंगे्रजन विद्रोह मानत रहय। जेकर दमन करे बर एगन्यू ह चांदा के पुलिस अधीक्षक केप्टन पेव ले मदद मांगिस। केप्टन पेव ह अंग्रेजी सेना के बल मं परील कोट के कं्रातिकारी मनके संग मं युद्ध करिस। जेन बेरा लगातार अट्ठारा दिन तक 24 दिसंबर ले 10 जनवरी 1825 तक क्रंातिकारी अउ अंग्रेज मनके बीच युद्ध चले रहिस। ये लड़ाई मं गैंद सिंह के द्वारा जैविक युद्ध करे जाय के घलव प्रमाण मिलथे। जिनमा इनकर द्वारा मंत्र तंत्र के षक्ति ले मछेव ’’मधु मक्खी’’ के आवाहन करे जावय अउ उनला अंगे्रज अउ मराठा सैनिक मनके उूपर छोंड़ देय जावत रहय। अंग्रेज अउ मराठा सैनिक मनला काट खावंय। उनला मधु मक्खी मनके कटई के मारे मैदान छोंड़ के भागतेच दिखय। उन आगू नई बढ़ पात रहंय। जेकर सेती गैंद सिंह ल युद्ध करे खातिर बने मउंका मिल जावत रहय। युद्ध मं कउनों पुरुष सिपाही गिर मर जांय त महिला सिपाही मनके द्वारा युद्ध चालू रखे जावै। फेरष्पुस्तैनी षस्त्र के धरे रहे के कारण अबूझ माड़िया अंग्रेज मनन के आधुनिक षस्त्र के आगू टिक नई पाईन। अंत मं उनकर पराजय होगे। 10 जनवरी तक युद्ध चले के बाद समाप्त होगे। अंग्रेज मन आखिर गेंद सिंह ल पकड़ डारिन। गंेद सिंह उपर अंग्रेज मनन झूंठ मंूठ के मुकदमा चलाइन। 20 जनवरी 1825 ई. के अंग्रेज मन गेंद सिंह ल ओकरे महल किला के आगूच मं फंासी लगा देइन। गैंद सिंह के बलिदान परल कोट के धरती के मुक्ति अउ बस्तर के अस्मिता के रक्षा के रक्षा मं परान तजे के एक सुरता राखे के लाइक उदाहण अउ अध्याय हे। गेंद सिंह ह अपन स्वाभिमान अउ मातृ भूमि के रक्षा अउ गुलामी ले मुक्ति के आंदोलन चलाय रहिस। गेंद सिंह के उत्सर्ग काल के निष्कर्ष ले निकरे एक स्वर्ण रेखा बरोबर हे। अंग्रेजन के विरूद्ध स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम षंखनाद करइया गैंद सिंह के आत्मोत्सर्ग अनूठा अउ अविस्मरणीय हे। हल्बा आदिवासी समाज संपूर्ण छत्तीसगढ़़ के माथा इस तथ्य के बोध ले गर्व ले उठे हुए हे। जेन बस्तर जइसन पिछडे़ आदिवासी बहुल अंचल मं स्वतंत्रता के चेतना के प्रथम बीजा रोपण गैंद सिंह जी ह करे हे। गैंद सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम बर बस्तर अउ छत्तीसगढ़ समेंत पूरा राष्ट के प्रथम षहीद माने मं बढ़ा चढ़ा के कहना नई हो सकय। राष्ट भक्ति अउ स्वाभिमान के रक्षा के पे्ररणा ग्रहण करना ही देश के प्रथम शहीद गेंद सिंह के प्रति सिरतोन श्रद्धांजलि होही।
सुराजी वीर अनंतराम बर्छिहा

सुराजी वीर अनंतराम बर्छिहा

10-Sep-2018
सुराजी वीर अनंतराम बर्छिहा
 
सत् मारग म कदम बढ़ाके, देश-धरम बर करीन हें काम।
वीर सुराजी वो हमर गरब आय, नांव जेकर हे अनंतराम।।
 
देश ल सुराज देवाय खातिर जे मन अपन जम्मो जिनिस ल अरपन कर देइन, वोमन म अनंतराम जी बर्छिहा के नांव आगू के डांड़ म गिनाथे। वो मन सुराज के लड़ाई म जतका योगदान देइन, वतकेच ऊँच-नीच, छुआ-छूत, दान-दहेज आदि के निवारण खातिर घलोक देइन, एकरे सेती एक बेरा अइसे घलोक आइस के अनंतराम जी ल अपन जाति-समाज ले अलग घलोक रहे बर लागिस। अछूतोद्धार के कारज खातिर गाँधी जी ह छत्तीसगढिय़ा गाँधी के नांव ले विख्यात पं. सुंदरलाल जी शर्मा के संगे-संग जम्मो छत्तीसगढ़ ल अपन गुरु मानिन, त एमा अनंतराम बर्छिहा जइसन मन के घलोक योगदान हवय।
 
अनंतराम जी बर्छिहा के जनम छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर ले करीब 24 कि.मी. दूरिहा म बसे गाँव चंदखुरी म 28 अगस्त सन् 1890 म होए रिहिसे। ए मेर ये जानना जरूरी हवय के रायपुर के उत्ती दिशा म बसे ये चंदखुरी ह उही ऐतिहासिक गाँव आय, जेला हमन दुनिया के एकमात्र कौशिल्या मंदिर खातिर जानथन। अनंतराम जी के माता के नांव यशोदा बाई अउ पिता के नांव हिंछाराम जी बर्छिहा रिहिसे।
 
अनंतराम जी के लइकई उमर के नांव नंदा रिहिसे। उंकर सियान हिंछाराम जी कुल 15 एकड़ खेती के जोतनदार रिहिन हें, एकरे सेती घर के आर्थिक स्थिति थोरुक कमजोर रिहिसे। बाबू नंदा ल चौथी कक्षा के बाद अपन पढ़ाई ल छोड़े बर परगे, अउ एकरे संग वो ह नांगर-बक्खर अउ खेती-किसानी म भीडग़े। इही बीच उंकर सियान सरग के रस्ता चल देइन। अब अतेक बड़ परिवार के जोखा-सरेखा नंदा के खांध म आगे, तेमा अकाल-दुकाल के मार। वो अइसे सुने रिहिसे के व्यापार करे म लछमी के आवक जल्दी होथे, एकरे सेती वो खेती के संगे-संग छोटकुन दुकान घलोक चालू करीस। तीर-तखार के गाँव मन म काँवर म समान धरके घलोक जावय। वोकर मेहनत अउ ईमानदारी ह रंग लाइस, अउ देखते-देखत वो बड़का बैपारी के रूप म अपन चिन्हारी बना डारिस। सिरिफ तीरे-तखार के गाँवेच भर म नहीं भलुक दुरिहा के गाँव मन म घलोक वोकर नांव के डंका बाजे लागिस।
 
सन् 1920 के बात आय। जब गाँधी जी रायपुर आइन त उंकर दरस करे के साध कर के बर्छिहा जी रायपुर आइन, अउ गाँधी जी के वाणी ल सुन के वो गाँधी जी के अनुयायी बनगें। वो बेरा ह तो स्वतंत्रता संग्राम के बेरा रिहिसे। पूरा देश म एकर लहर चलत रिहिसे, तेकरे सेती जम्मो मनखे के मन म कोनो न कोनो किसम ले सुराज के भावना मन रहिबे करय, त भला अनंतराम वो लहरा ले कइसे बांचे सकत रिहिसे। छत्तीसगढ़ अंचल लोकमान्य तिलक के आंदोलन ले प्रभावित हो चुके रिहिसे। पं. माधवराव सप्रे ह सन् 1900 म 'छत्तीसगढ़ मित्रÓ के प्रकाशन चालू कर डारे रिहिसे। 1903 म भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्थापना रायपुर म होगे रिहिसे। सन् 1907 म स्वदेशी जिनिस मनके दुकान खुलगे रिहिसे। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती 'सामाजिक असमानताÓ के खिलाफ संघर्ष करत बिलासपुर तक आगे रिहिन हें।
 
एकर प्रभाव पूरा छत्तीसगढ़ म परत रिहिसे। अइसन म युवा अनंतराम के मन म ए सबके प्रभाव कइसे नइ परतीस? बर्छिहा जी के अपन कुर्मी जाति समाज तो पहिलीच ले ए मारग म आगू बढ़ चुके रिहिसे। गाँधी जी के आगमन तो ये सुलगत आगी म घीव के कारज करीसे। अइसन म बर्छिहा जी भला कहाँ पाछू रहितीन, उहू मन अपन दुकानदारी के जम्मो काम-काज ल अपन छोटे भाई सुखराम बर्छिहा के खांध म सौंप के राष्ट्रीय आंदोलन म कूद गें।
 
सन् 1923 म नागपुर म झंडा सत्याग्रह चालू होइस। छत्तीसगढ़ के जम्मो खुंट ले सत्याग्रही मन नागपुर पहुंचे लागिन। वो सत्याग्रह म भाग लेके छै-छै महीना के सजा घलोक काट आइन। बर्छिहा जी के ये पहली जेल यात्रा रिहिसे, जेला उन नागपुर केंद्रीय जेल म काटिन। वोकर बाद तो उन घर-बार ल छोड़ के गाँव-गाँव अलख जगाये लागिन। एकर सेती उनला सन् 1930 म एक पइत फेर एक बछर के सजा होइस। सन् 1930 के आंदोलन के केंद्र चंदखुरी च गाँव ह बनगे रिहिसे, जेकर प्रसिद्धि पूरा देश भर म होए रिहिसे। वो गाँव के मन अनंतराम बर्छिहा के अगुवई म असहयोग आंदोलन म बड़का भूमिका निभाए रिहिन हें। गाँव-गाँव जाके विदेशी जिनिस मनके बहिष्कार के बात करयं, वो जिनिस मनके होरी बारयं, छुआछूत मिटाए के बात करयं, खादी ग्रामोद्योग के प्रचार करयं, सहभोज के आयोजन करयं, बीमार मनखे मन के सेवा करयं, उनला दवई बांटंयं, गाँव के साफ-सफाई करयं, नान्हें लइका मनला पढ़े खातिर  प्रोत्साहित करयं।
 
चंदखुरी गाँव वो बखत राष्ट्रीय आंदोलन के गढ़ बनगे रिहिसे। अइसे म  फिरंगी शासन कब तक कलेचुप बइठे रहितीस? गाँव म पुलिस के घेरा डार दिए गेइस। एक बटालियन पुलिस उहां तैनात कर दे गइस। फेर वो पुलिस वाला मनके गुजारा होतिस कइसे? सरकारी व्यवस्था के खिलाफ म तो आंदोलन होवत रिहिसे। पुलिस वाले मनला मांगे म कोनो आगी-पानी तक नइ देवत रिहिन हें। बर्छिहा जी के दुकान म बिसाए म घलोक कोनो समान नइ मिलत रिहिसे। अइसन म पुलिसवाला अउ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन के आपस म ठनना स्वभाविक रिहिसे। ए बगावत के असर आसपास के अउ आने गाँव मन म घलोक बगरत जावत रिहिसे।
एकर जानकारी जिला के अधिकारी मन जगा घलोक पहुंचीस। जिला कप्तान चंदखुरी पहुंचीस अउ उहां के लोगन ल समझाए-बुझाए के उदिम करिस। बर्छिहा जी के दुकान ले समान लेना चाहिस। उंकर जगा संदेश भेजवाइस। जेकर जवाब मिलिस- 'आप हमर इहाँ मेहमान बनके आहू त आपके सुवागत हे, फेर कहूं सरकारी अधिकारी बनके आहू, त आपला हमर असहयोग हे।Ó ए जुवाब ले अधिकारी चिढग़े, अउ पूरा गाँव म कहर मचा देइस। घुड़सवार पुलिस वाला मन पहुंचीन अउ पूरा गाँव ल रौंद डारिन। बर्छिहा जी के दुकान ल लूट डारिन। अतको म उंकर मन नइ माढि़स त घोसना कर डारिन के बर्छिहा जी के दुकान ले जेन कोनो उधारी लिए होहीं वोला वापस झन करे जाय। संग म अनंतराम बर्छिहा के संगे-संग गाँव के अउ सात झनला गिरफ्तार करके जेल भेज देइन। गिरफ्तार लोगन म रिहिन हें- बर्छिहा जी के छोटे भाई सुखराम बर्छिहा, बर्छिहा जी के बड़े बेटा वीर सिंह बर्छिहा, नन्हे लाल वर्मा, गनपतराव मरेठा, हजारीलाल वर्मा, नाथूराम साहू अउ हीरालाल साहू।
बर्छिहा जी के लाखों रुपिया के संपति नष्ट होगे, जेकर निसानी ल आजो देखे जा सकथे। उन सेठ ले फेर फकीर होगे रिहिन हें। तभो ले उनला एक साल के फेर सजा होगे, अउ संग म जुर्माना घलोक लाद देइन। जुर्माना नइ पटाए के सेती उंकर नांगर-बख्खर, गाय-बइला आदि के नीलामी कर दे गइस। बर्छिहा जी के संग ये सिलसिला सन् 1942 तक सरलग चलीस।
 
सन् 1930-32 के जेल यातना ह आज कस सहज नइ रिहिसे। उंकर मन जगा चक्की चलवायं, घानी म बइला के जगा उनला फांद के तेल पेरवायं, पानी के रहट चलवायं। उनला लोहा के बरतन म खाना देवयं, तेल-साबुन के तो नामे नइ रिहिसे। पहिने खातिर एक जांघिया अउ एक बंडी, कनिहा म बांधे खातिर एक ठन पंछा अउ एक ठन टोपी। बिछाए अउ ओढ़े खातिर दू ठन कमरा अउ एक ठन टाटपट्टी। फेर सत्याग्रही मन म कतकों अइसे राहयं, जेन खादी के छोड़ अउ कोनो जिनिस के उपयोगेच नइ करत रिहिन हें। अनंतराम जी घलोक वइसने खादी धारी रिहिन हें, उन दूसर कपड़ा मनला उपयोग नइ करत रिहिन हें, तेकरे सेती जेल म उन नग्न अवस्था म राहयं। सिरिफ लोक मर्यादा खातिर उन एक ठन कमरा ल लपेट ले राहयं। अइसन खादी व्रतधारी रिहिन हें बर्छिहा जी।
 
अब चिटिक उंकर सामाजिक क्रांतिकारी रूप के चरचा। सन् 1933 ह अस्पृश्यता निवारण के इतिहास म बहुते महत्वपूर्ण बछर आय। बाबा साहेब अंबेडकर अउ गाँधी जी के बीच होए पुना पेक्ट के अनुसार अस्पृश्यता के कलंक ल मिटाए खातिर पूरा देश म अभियान चालू करिन। छुआछूत के संगे-संग, कुरीती, गरीबी, अज्ञानता, अशिक्षा ल मिटा के स्वावलंबन के रद्दा देखाइन। ये जम्मो बात बर्छिहा जी के अंतस म उतर आइन। अउ ये जम्मो कारज के शुरुवात उन अपनेच घर ले चालू करीन।
 
वो बखत जम्मो गाँव-घर म छुआछूत के चलन भारी मात्रा म होवत रिहिसे। उन अपनेच गाँव के अइसन जाति कहाने वाला लोगन ल सामाजिक अधिकार देवाए खातिर आंदोलन चलाइन। अइसन जाति-समाज के लोगन मन सार्वजनिक कुंआ ले पानी नइ ले सकत रिहिन हें, वोकर मन खातिर उन अपन घर के कुंआ ल खोलवाइन। मरदनिया मन उंकर हजामत नइ बनावत राहंय, त उन खुद उंकर मनके हजामत बनावयं। धोबी के कारज ल घलोक उन खुदे करयं। उन अस्पृश्यता के खिलाफ आंदोलन चलाइन तेकर सुफल ये होइस के उंकर गाँव के मंदिर ह सबो मनखे खातिर खुलगे। गाँव के वातावरण तो उंकर अनुकुल होगे, फेर वोकर खुद के जाति-समाज के मुखिया मनला ये सब बात नइ सुहाइस, अउ उन बर्छिहा जी के परिवार ल अपन जाति ले बाहिर के रद्दा देखा देइन।
 
उंकर ले रोटी-बेटी के संबंध, पौनी-पसारी के संबंध, घाट-घटौंदा के संबंध जम्मो ल बंद कर दिए गेइस। वो बखत के स्थिति के चित्रण करत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अउ सामाजिक नेता डॉ. खूबचंद बघेल ह लिखे हवयं- 'गाँव के परिस्थिति विस्फोटक होगे रिहिसे। पांचों पवनी माने- नाऊ, धोबी, राउत, मेहर अउ लोहार मन उंकर जम्मो काम-धाम ल छोड़ दिए रिहिन हें। उंकर समाज उंकर संग जम्मो किसम के व्यवहार ल बंद कर दिए रिहिसे, तभो ले बर्छिहा गाँधी जी के आदर्श म चलत मगन राहयं।Ó
 
वो समय तक मनवा कुर्मी समाज म प्रगतिशीलता आए ले धर लिए रिहिसे। बर्छिहा जी के ही विचार ल मानने वाला एक परिवार उंकर बेटी ल अपन बहू के रूप म ले के समाज ले बहिष्कृत होए बर तइयार होगे। फेर बात अतकेच म नइ बनिस। काबर ते बर्छिहा जी के एक ठन अउ संकल्प रिहिसे के 'न तो वो दहेज लेवय, अउ न दहेज देवय।Ó वो ककरो समझाए म घलोक नइ समझत रिहिन हें। तब वो परिवार वाले मन अइसनो खातिर मानगें।
 
बर्छिहा जी के जम्मो शर्त ल मानने वाला परिवार दुरुग जिला के सिलघट नामक गाँव के टिकरिहा परिवार रिहिसे। ये बिहाव के जुराव ल मनवा कुर्मी समाज ल दो भाग म बांट देइस। जुन्ना पीढ़ी ए मन ल सबक सिखाए खातिर त नवा पीढ़ी ए नवा सामाजिक सुधार ल लागू करे खातिर। नवा पीढ़ी के वो बखत मुखियाई करत रिहिन हें- डॉ. खूबचंद बघेल, जगन्नाथ बघेल, दुर्गासिंह सिरमौर, प्रेमतीर्थ बघेल, जयसिंह वर्मा, वीरसिंह बर्छिहा के संगे-संग आने समाज के वो समय के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मन, जे मन वो बिहाव के पतरी उठाए ले लेके जम्मो किसम के नेंग-जोंग सबो ल करीन।
 
बर्छिहा जी के बेटी राधबाई ह खादी के साड़ी पहिन के मंडप म बइठिस। भांवर के बाद दहेज के रूप म सिरिफ एक ठन सूत काते के चरखा अउ पानी दे गेइस। अइसन आदर्श बिहाव ये छत्तीसगढ़ अंचल म एकर पहिली कभू नइ होए रिहिसे। आज घलोक अइसन आदर्श के चरचा न तो कहंू सुने ल मिलय अउ न देखे ल। बर्छिहा जी अइसन महापुरुष रिहिन हें, जेन सामाजिक क्रांति के शुरुआत अपनेच घर ले करे रिहिन हें।
 
बर्छिहा जी म संघर्षशीलता के संगे-संग प्रशासनिक क्षमता घलोक रिहिस हे। उन कई बछर तक तहसील कांग्रेस के अध्यक्ष रिहिन। सन् 1937 म अपन अंचल ले विधायक घलोक बनीन। उन जब तक जीइन दीया बनके जीइन, लोगन बर अंजोर करीन। छत्तीसगढ़ महतारी के ये सपूत ह अपन पूरा जीवन ल देश खातिर समरपित कर देइस। 22 अगस्त सन् 1952 के उन ये नश्वर दुनिया ले बिदा ले लेइन।
 
सुशील भोले
41-191, डॉ. बघेल गली,
संजय नगर (टिकरापारा) रायपुर (छ.ग.)
मोबा. नं. 098269 92811
चंदुलाल चंद्रकार

चंदुलाल चंद्रकार

04-Sep-2018
चंदूलाल मेडिकल कॉलेज का 210 करोड़ रुपए में हुआ सौदा, संतोष रूंगटा ग्रुप संभालेगा प्रबंधन प्रदेश का निजी क्षेत्र का पहला मेडिकल कॉलेज चंदूलाल चंद्राकर मेमोरियल मेडिकल कॉलेज को आखिरकार खरीदार मिल ही गया। उसे संतोष रूंगटा ग्रुप ने 210 करोड़ में खरीद लिया। जिसके बाद कॉलेज पर मंडरा रहा तालाबंदी का संकट टल गया है। नीट द्वारा मेडिकल कॉलेज के प्रवेश में मैनेजमेंट कोटा समाप्त होने के बाद से ही चंदूलाल चंद्राकर मेडिकल कॉलेज प्रबंधन वित्तीय संकट में घिर गया था। उसके बाद से वह कॉलेज को बेचने के लिए खरीदार तलाश रहा था। तमिलनाडु की एक शिक्षण संस्था ने इसे खरीदने में रूचि भी दिखाई थी और एडवांस के रूप में कुछ रकम भी भुगतान कर दिया था लेकिन बाद में किसी कारण से उस संस्था ने सौदा निरस्त कर दिया। जिसके बाद शहर के ही संतोष रूंगटा ग्रुप ने मेडिकल कॉलेज को खरीदने सामने आया। दो-तीन दौर की बैठक के बाद चंदूलाल चंद्राकर मेमोरियल मेडिकल कॉलेज प्रबंधन 210 करोड़ में कॉलेज संतोष रूंगटा ग्रुप को बेचने पर सहमति बनी। जिसके बाद नए ग्रुप कॉलेज का संचालन अपने हाथ में लेना शुरू कर दिया है। खर्च 100 करोड़, जनरेट हो रहा था 30 करोड़ रुपए: हर वर्ष संचालन के लिए करीब 100 करोड़ की जरूरत होती है। कोटा समाप्त होने के बाद मिलने वाली फीस से महज 30 करोड़ ही जनरेट हो रहे थे। चंदूलाल चंद्राकर मेडिकल कॉलेज। स्टाफ की कमी को जल्द करेंगे दूर संतोष रूंगटा ग्रुप ने कॉलेज का संचालन हाथ में लेते ही स्टाफ की कमी को दूर करने के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी है। कॉलेज में वर्तमान में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर, सीनियर रेसीडेंट्स और जूनियर रेसीडेंट्स के कई पद खाली है। इनमें अनाटोमी, बायोकेमेस्ट्री, पैथोलॉजी, माइक्रोबायलाजी, फोरेंसिक मेडिसिन, कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के रिक्त पद शामिल हैं। वहीं क्लीनिक्स में जनरल मेडिसिन, टीबी समेत अन्य विभागों में भर्ती की जाएगी। टेकओवर की प्रक्रिया शुरू पहले तामिलनाडु की एक संस्था ने दिया था एडवांस 200 करोड़ रुपए की देनदारी है प्रबंधन पर पुराने प्रबंधन पर बैंक और मार्केट की 200 करोड़ रुपए की देनदारी है। इनमें करीब 150 करोड़ रुपए इंडियन बैंक और सेंट्रल बैंक से लोन के रूप में है। जिनकी हर महीने की ईएमआई ही करीब 4 करोड़ रुपए हो रही है। 3 महीने से अधिक समय ईएमआई का भुगतान नहीं हुआ था। जबकि तीन महीने तक भुगतान नहीं होने की स्थिति में बैंक प्रबंधन ऐसे खातों को एनपीए में डाल सकता है। वहीं स्टाफ को वेतन भी भुगतान नहीं हो पा रहा था। इसके चलते कॉलेज में तालाबंदी की नौबत आ गई थी। कॉलेज के बिकने से यह संकट टल गया। चंदूलाल मेडिकल कॉलेज खरीदने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद टेकओवर की प्रक्रिया शुरू हो गई। एक-एक कर विभागों का संचालन अपने हाथों में ले रहे हैं। स्टाफ की कमी को दूर करने के लिए नई भर्ती कर रहे है। सोनल रूंगटा, डायरेक्टर, संतोष रूंगटा ग्रुप प्रवेश निरस्त होने से गड़बड़ाई व्यवस्था शिक्षा सत्र 2017-18 से सरकार ने मैनेजमेंट कोटा समाप्त कर दिया। जिस दिन आदेश जारी हुआ उसके पहले ही चंदूलाल चंद्राकर मेडिकल कॉलेज में मैनेजमेंट सीट के लिए प्रवेश की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। इसके चलते विद्यार्थियों को सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी।